बालेन शाह की संतुलन नीति

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मार्च 2026 में सत्तारूढ़ हुए नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र बालेन शाह अपने पहले विदेशी दौरे पर भारत आने वाले हैं। रैपर से राजनेता बने 35 वर्षीय शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण को तुरंत स्वीकार कर लिया। दोनों देशों के विदेश मंत्रालय अब यात्रा की तैयारियों में जुटे हैं। यह दौरा शाह की पहली बड़ी कूटनीतिक पहल होगा। इसके व्यापार, कनेक्टिविटी तथा क्षेत्रीय सहयोग पर केंद्रित रहने की संभावना है। लेकिन इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यह यात्रा नेपाल की नई संतुलन नीति की पहली परीक्षा बनेगी। वह नीति जो भारत और चीन के बीच समान दूरी तथा समान निकटता का दावा करती है।

याद रहे कि शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के घोषणापत्र में नेपाल को भारत-चीन के बीच वाइब्रेंट ब्रिज बनाने की बात कही गई है। आठ अप्रैल को उन्होंने 17 राजदूतों (भारत, चीन, अमेरिका, जापान, कतर समेत) को एक साथ बुलाकर यह साफ कर दिया कि काठमांडू अब किसी एक पड़ोसी को प्राथमिकता नहीं देगा। नेपाल फर्स्ट और नॉन-अलाइनमेंट के सिद्धांत पर चलते हुए विकास कूटनीति ही उसकी प्राथमिकता होगी।

पुरानी नीतियों से अलग नई संतुलन रणनीति

यह पुरानी पार्टियों – नेपाली कांग्रेस की भारत-झुकाव वाली और कम्युनिस्टों की चीन-कार्ड वाली – नीति से एकदम हटकर है। युवा जनादेश पर सवार शाह घरेलू स्तर पर सुधार के 100-सूत्री एजेंडे पर काम कर रहे हैं। विदेश नीति में भी वे उसी नएपाली अंदाज का प्रदर्शन करना चाहते हैं! सयाने बता रहे हैं कि यह संतुलन नीति के भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों है। नेपाल भारत का सबसे खुला पड़ोसी है।

खुली सीमा, खुले सांस्कृतिक-सामाजिक संबंध और व्यापारिक निर्भरता। शाह की यात्रा से ऊर्जा, बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य और व्यापार के नए समझौते हो सकते हैं। अगर भारत उदारता दिखाए – जैसे जलविद्युत निर्यात, रेल-रोड कनेक्टिविटी और युवा-केंद्रित निवेश – तो नेपाल की अर्थव्यवस्था को भारत-केंद्रित विकास का मजबूत आधार मिलेगा। इससे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) का प्रभाव भी संतुलित होगा।

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उधर नेपाल के लिए यह नीति विकास का अवसर है। दोनों बड़े पड़ोसियों के आर्थिक उदय का लाभ उठाकर वह बफर स्टेट से ट्रांजिट हब बन सकता है। लिपुलेख दर्रा जैसे मुद्दों पर भी त्रिपक्षीय सहयोग की गुंजाइश बनेगी। लेकिन आलोचनाएं भी कम नहीं। सबसे बड़ी आलोचना अनुभव की है। शाह और उनकी टीम कूटनीति में नए हैं। मेयर काल में ग्रेटर नेपाल मानचित्र प्रदर्शन और कुछ भारत-विरोधी बयानों की छाया अभी भी है।

भारत पर व्यापार निर्भरता, संतुलन नीति की चुनौती

संतुलन की बात जितनी आकर्षक है, उतनी ही कठिन भी। भूगोल भारत की तरफ झुका है – 90 प्रतिशत व्यापार भारत से होता है। चीन बीआरआई के जरिए सड़क-रेल दे सकता है, लेकिन भारत बिना शर्त सांस्कृतिक और जन-स्तरीय विश्वास देता है। अगर शाह समानता के नाम पर भारत की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करेंगे तो नतीजा नेपाल के हित में नहीं होगा। सयाने इसे हेजिंग कह रहे हैं – न तो चीन-कार्ड, न भारत-कार्ड, बल्कि दोनों से अधिकतम लाभ! पर व्यावहारिक रूप से यह नीति नेपाल को ट्रैप भी कर सकती है। पारंपरिक दल यही डर तो दिखा रहे हैं न कि युवा उत्साह कूटनीति की जटिलताओं को समझ नहीं पाएगा!

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फिर भी बालेन शाह की यात्रा सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाती है कि नई पीढ़ी पुरानी वैचारिक जकड़नों से मुक्त होकर व्यावहारिक रास्ता चुन रही है। भारत को इस अवसर का पूरा फायदा उठाना चाहिए। न केवल आर्थिक पैकेज, बल्कि युवा-केंद्रित कार्यक्रमों- शिक्षा, कौशल और डिजिटल कनेक्टिविटी – के जरिए नेपाल के नए नेतृत्व को भरोसे में लेना चाहिए। अगर दोनों देश संतुलन को सहयोग का संतुलन बना सकें तो हिमालयी स्थिरता मजबूत होगी और पड़ोसी प्रतिस्पर्धी के स्थान पर साझा समृद्धि के भागीदार बन सकेंगे।

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