प्रभु भक्ति से बड़ा कोई लाभ नहीं : हरिप्रियाजी वैष्णवी
हैदराबाद, कथा का उद्देश्य यश, प्रतिष्ठा और नाम पाना नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति को जगाना है। भक्ति ऐसी हो कि एक बार जीवन में आ जाए, तो भक्ति साथ मुक्ति मिल जाती है। जीवन में भक्ति बड़ा कोई लाभ नहीं।
उक्त उद्गार सिद्दिअम्बर बाजार स्थित बाहेती भवन में राजस्थानी जागृति समिति द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस कथा की महत्ता बताते हुए कथा वाचक बाल विदुषी सुश्री हरिप्रिया वैष्णवी ने दिये। उन्होंने कहा कि जिस दिन जीव के हृदय में बात बैठ जायेगी, की संसार हमारा नहीं है, उस दिन संसार के सारे बंधन छूट जायेंगे। व्यक्ति हमेशा दुनिया को अपनी मानता है, इसलिए भटकता रहता है, लेकिन वो जिस दिन कहेगा ठाकुरजी मेरे हैं, तो उस दिन से जीवन का आनंद बढ़ जायेगा।
राजा परीक्षित को शुकदेव जैसे गुरु मिलने की महिमा
इच्छा हो तो थोड़ी कथा सुने, थोड़ी माला फेरें और थोड़ा भजन शुरु करें, इस प्रकार प्रतिदिन सेवा कर ठाकुरजी की याद बनाये रखें। यही जीवन का परम कर्तव्य है। सुश्री हरिप्रियाजी ने कहा कि राजा परीक्षित प्रसन्न हुए कि उन्हें शुकदेव जैसा गुरु मिला जिन्होंने भगवान की सारी कथा सुनी। कई लोग कथा का आयोजन इसलिए करवाते हैं कि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। श्रीमद् भागवत कथा इसलिए करवाई जाती है कि मृत्यु महोत्सव की तरह मनाई जाए।
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जिस प्रकार राजा परीक्षित को कथा श्रवण से वैराग्य हो गया, फिर उन्हें न पत्नी की और न बच्चों की परवाह थी। परीक्षित महाराज कहते हैं कि कथा से मृत्यु सफल हो चुकी।हरिप्रियाजी ने सुदामा चरित्र की महिमा बताते हुए कहा कि वे बहुत ही संतोषी जीव थे और श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। भागवत कथा के सार के पश्चात उन्होंने कथा को विराम दिया और सभी का आभार प्रकट किया। अवसर पर श्रीनिवास सोमाणी, गोविन्द बिरादर, बालाप्रसाद लड्डा, आशा देवी सोमाणी, संजय राठी, रमेश मोदानी, मनीष सोमाणी सहित अन्य उपस्थित थे।
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