सूडान युद्ध का क्रूर चेहरा : नरक भोगतीं महिलाएँ

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अफ्रीकी देश सूडान में जारी भीषण संघर्ष ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक युद्धों का सबसे क्रूर चेहरा महिलाओं और बच्चों पर ही प्रकट होता है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट – सूडान: युद्ध के जारी विनाश में, तीन-चौथाई महिलाएँ असुरक्षित- इस मानवीय संकट की भयावहता को रेखांकित करती है। यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज का दर्पण है जहाँ जीवन, गरिमा और सुरक्षा लगातार क्षत-विक्षत हो रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट बताती है कि सूडान में लगभग 75 प्रतिशत महिलाएँ किसी न किसी प्रकार की असुरक्षा का सामना कर रही हैं। इसमें यौन हिंसा, जबरन विस्थापन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और खाद्य संकट जैसे आयाम शामिल हैं। संघर्ष के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँचा लगभग ध्वस्त हो चुका है, जिससे गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। साथ ही, मानवीय सहायता तक पहुँच भी बेहद सीमित हो गई है।

युद्ध में यौन हिंसा का हथियार के रूप में इस्तेमाल

कहना न होगा कि इस संकट का पहला और सबसे विकट आयाम लैंगिक हिंसा है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा एक हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। यह न केवल व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि समाज की संरचना को भी तोड़ने वाला कारक है। दुर्भाग्य यह है कि इस पाशविकता के लिहाज से सारी दुनिया कमोबेश एक ही जैसी स्त्रा-द्वेषी है!दूसरा आयाम मानवीय आपदा का है। विस्थापन, भूख और स्वास्थ्य संकट मिलकर महिलाओं की स्थिति को और अधिक दयनीय बना देते हैं। जब बुनियादी जरूरतें ही पूरी नहीं होतीं, तो सुरक्षा और सम्मान जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं!

तीसरा आयाम सामाजिक विघटन का है। परिवारों के टूटने और सामाजिक ताने-बाने के बिखरने से महिलाओं पर अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं। वे परिवार की देखभाल, बच्चों की सुरक्षा और आजीविका का बोझ एक साथ उठाने को मजबूर होती हैं। चौथा आयाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति और उदासीनता का है। वैश्विक शक्तियों का ध्यान अक्सर रणनीतिक हितों तक सीमित रहता है, जिससे सूडान जैसे देशों के मानवीय संकट हाशिये पर चले जाते हैं।

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अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर उठते सवाल

यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। यहाँ तनिक ठहरकर नई उभरती ग्लोबल व्यवस्था के बरक्स भारत से अपेक्षाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधि मानता है न! तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह ऐसे मुद्दों पर मुखर भूमिका निभाए। मानवीय सहायता, कूटनीतिक प्रयास और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सािढय हस्तक्षेप के माध्यम से भारत इस संकट को कम करने में योगदान दे सकता है।

साथ ही, यह संकट यह भी दर्शाता है कि वैश्विक शांति और स्थिरता केवल सैन्य या आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण नीतियों से सुनिश्चित होती है। इस विषम स्थिति से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयासों की ज़रूरत है। इनमें तत्काल युद्धविराम और शांति वार्ता, महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष तंत्र, स्वास्थ्य और खाद्य सहायता का विस्तार, तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा वित्तीय और तकनीकी सहयोग शामिल हो सकते हैं।

अंतत, सूडान का संकट केवल एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक मानवता की परीक्षा है। जब तक दुनिया के किसी भी कोने में महिलाएँ इस प्रकार असुरक्षित हैं, तब तक विकास और प्रगति के दावे अधूरे हैं। अब कोरी सहानुभूति नहीं, ठोस और निर्णायक कार्रवाई की ज़रूरत है; ताकि युद्ध के घोर अंधेरे में भी मानवता की रोशनी कायम रह सके।

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