वह केवल लाभार्थी नहीं, निर्णायक शक्ति !

Ad

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रचार ने इस बार एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण प्रवृत्ति को उजागर किया है – महिलाओं को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीतियों का निर्माण। विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को आकर्षित करने के लिए किए जा रहे वादों, योजनाओं और प्रतीकात्मक कदमों ने इस बात को रेखांकित किया है कि महिला मतदाता अब केवल एक मतदाता वर्ग नहीं, बल्कि चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाली शक्ति बन चुकी हैं। किंतु यह भी उतना ही ज़रूरी है कि इन प्रयासों के औचित्य और अनौचित्य की समुचित परीक्षा की जाए।

सबसे पहले, यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं बनाना अपने आपमें अनुचित नहीं है। लंबे समय तक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से उपेक्षित रही महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए लक्षित नीतियाँ जरूरी हैं। पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं की बड़ी संख्या और उनकी बढ़ती राजनीतिक जागरूकता को देखते हुए, दलों द्वारा उनके लिए सुरक्षा, आर्थिक सहायता, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े वादे करना एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

लोकतंत्र में हर वर्ग की जरूरतों पर आधारित नीतियाँ

यह लोकतंत्र के उस सिद्धांत को भी मजबूत करता है, जिसमें प्रत्येक वर्ग की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाई जाती हैं। हालाँकि, समस्या तब पैदा होती है जब ये प्रयास वास्तविक सशक्तिकरण की बजाय केवल तात्कालिक लाभ या चुनावी लालच तक सीमित रह जाते हैं। कमोबेश सारे ही दल नकद सहायता, मुफ्त सुविधाएं या अल्पकालिक योजनाओं के जरिए महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे उपाय, भले ही तुरंत आकर्षक लगें, लेकिन वे दीर्घकालिक समाधान प्रदान नहीं करते। इससे महिलाओं की वास्तविक समस्याएं – जैसे रोजगार के अवसरों की कमी, कार्यस्थल पर सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता – पिछले पायदान पर चली जाती हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ राजनीतिक दल महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि नीति-निर्माण में भागीदार के रूप में। यह नज़रिया महिलाओं की भूमिका को सीमित करता है और उनके राजनीतिक सशक्तिकरण के व्यापक उद्देश्य को कमजोर करता है।

Ad

महिलाओं को केवल योजनाओं के उपभोक्ता के रूप में देखना, उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखने के समान है। जबकि ज़रूरत इस बात की है कि उन्हें नेतृत्व और नीति-निर्माण में अधिकाधिक अवसर दिए जाएं। औचित्य की दृष्टि से, यदि कोई दल महिलाओं के लिए दीर्घकालिक और संरचनात्मक सुधारों की बात करता है – जैसे कौशल विकास, स्वरोजगार के अवसर, स्वास्थ्य ढांचे का सुदृढ़ीकरण और कानून-व्यवस्था में सुधार – तो ऐसे प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए। ये कदम न केवल महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारते हैं, बल्कि समाज के समग्र विकास में भी योगदान देते हैं।

चुनावी वादों में अनौचित्य और उनकी सीमाएं

इसके विपरीत, अनौचित्य तब स्पष्ट होता है जब चुनावी लाभ के लिए बिना वित्तीय या प्रशासनिक आधार के, वादे किए जाते हैं। ऐसे वादे न केवल अव्यावहारिक होते हैं, बल्कि चुनाव के बाद निराशा और अविश्वास को जन्म देते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। दरअसल, ज़रूरत इस बात की है कि महिला मतदाता भी इन वादों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करें।

यह भी पढ़ें… ग़ाज़ा : मृत स्त्री-देहों पर अंकित युद्ध के हस्ताक्षर

केवल तात्कालिक लाभ के आधार पर निर्णय लेने के बजाय, उन्हें यह देखना होगा कि कौन-सी नीतियां उनके दीर्घकालिक हितों की रक्षा करती हैं। राजनीतिक दलों के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है कि वे महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ें और उन्हें सशक्त नागरिक के रूप में स्वीकार करें। कुल मिलकर, पश्चिम बंगाल का यह चुनाव इस मायने में बेहद अहम है कि यह तय करेगा कि महिलाओं को लेकर राजनीतिक विमर्श सतही रहेगा या वास्तविक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ेगा। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हर वर्ग को सम्मानजनक और सार्थक भागीदारी मिले – और महिलाएं इसमें कोई अपवाद नहीं हैं।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Ad

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button