सुखी रहने के लिए नाता प्रभु से जोड़ो : पवन कुमार मालोदिया

हैदराबाद, व्यक्ति हमेशा संसार से संबंध रखता है इसलिए दुखी होता है, लेकिन जो भगवान के साथ संबंध जोड़ता है वही सुख में रहता है। नरसी मेहता ने भगवान के साथ संबंध जोड़ा इसलिए जीवन में हर कार्य सांवरिया सेठ ने आगे आकर किया। उक्त उद्गार लोअर टैंकबंड स्थित भाग्यनगर गौसेवा सदन में माहेश्वरी सेवा संघ, माहेश्वरी महिला मंडल, माहेश्वरी युवती संगठन, माहेश्वरी युवा संगठन सिकंदराबाद द्वारा आयोजित नानी बाई को मायरो के तृतीय दिवस कथा वाचक पं. पवन कुमार मालोदिया (वरंगल) ने दिये।

पवन जी ने कहा कि नरसी मेहता की कथा जितना भी सुनो, मन नहीं भरता है। कथा इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि नरसी मेहता ने अपना संबंध भगवान के साथ जोड़ा था। हमें अपने पूर्वज याद नहीं, पर नरसीजी के पूर्वज याद हैं, क्योंकि कथा का बार-बार स्मरण करते हैं। जीवन में कितने भी व्यस्त हों, लेकिन कम से कम 15 मिनट का समय भगवान को दें। प्रभु का स्मरण करें, भजन करें। संसार को कामकाज नहीं, भगवान की भक्ति दिखती है। आज कथा विश्राम का दिन है इसलिए भगवान के चरण में समर्पण करें।

भक्तों पर द्वारकाधीश की कृपा का वर्णन

पवन कुमार मालोदिया ने आगे कहा कि अपना संबंध भगवान से नहीं है इसलिए जीवन में भटकाव होता है लेकिन वहीं नरसीजी का संबंध भगवान से था, इसलिए हर कार्य प्रभु ने बिना कहे किया। जीवन में रिश्ता संसार से नहीं बल्कि भगवान से जोड़ो। हर भोजन से पहले प्रभु को भोग लगायें, क्योंकि भगवान से जुड़ने के बाद साधारण अन्न भी प्रसाद हो जाता है। महापुरुषों की वाणी है कि जो नित्य भगवान को पहले भोग लगाकर भोजन करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। वह गोविन्द के धाम को स्वत ही चला जाता है।

पं. पवन मालोदिया ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि नरसी मेहता भगवान श्रीकृष्ण पर भरोसा करते हुए अपने संतों की टोली के साथ बेटी को आशीर्वाद देने के लिये अंजार नगर पहुँच गये। उन्हें आते देख नानी बाई के ससुराल वाले भड़क गये और अपमान करने लगे। इस अपमान से नरसी जी व्यथित हो, रोते हुए श्रीकृष्ण को याद करते हुए, वहाँ से चल दिए। नानी बाई भी अपने पिता के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आत्महत्या करने दौड़ पड़ी परन्तु श्री कृष्ण ने नानी बाई को रोक दिया और कहा कि कल वे स्वयं नरसी के साथ मायरा भरने के लिये आयेंगे।

दूसरे दिन नानी बाई बड़ी ही उत्सुकता के साथ श्री कृष्ण और नरसी जी का इंतज़ार करने लगी, तभी सामने देखती हैं कि नरसी जी संतों की टोली और कृष्ण जी एक सेठ का रूप धारण करके साथ चले आ रहे हैं। उनके पीछे ऊँटों और घोड़ों की लम्बी कतार आ रही है, जिन पर सामान लदा हुआ है। दूर-दूर तक बैलगाड़ियाँ ही बैलगाड़ियाँ नज़र आ रही थीं, जितनी सूची थी, उससे दुगुना सामान मायरे में पहुँचा।

भक्तों पर द्वारकाधीश की कृपा का वर्णन

यह सब देखकर ससुराल वाले अपने किये पर पछताने लगे। कहते हैं भगवान द्वारकाधीश ने स्वर्ण मुद्राओं की ऐसी वर्षा की कि गाँव वाले भी धनी हो गए। भगवान केवल अपने भक्तों के वश में होते हैं। कथा को विश्राम देते हुए महाराज ने आयोजकों का आभार व्यक्त किया।

अवसर पर मुख्य यजमान गोपाललाल-सुमित्रा बंग, सह-यजमान श्रीकुमार-शीतल मोदानी, जानकीलाल कृष्णा संघी, संयोजक राजकुमार सोनी, सह-संयोजक जगन्नाथ भगवानदास जाजू, शिवराज रामकिशोर झंवर, सोहनलाल आनंद कुमार बंग, अध्यक्ष प्रवीण तोष्णीवाल, मंत्री विष्णुकांत बजाज, कोषाध्यक्ष श्रीकुमार मोदानी, उपाध्यक्ष नरेश बाहेती, आनंद कुमार जाजू, सह-मंत्री आदित्य मूंदड़ा, सह-कोषाध्यक्ष वीरेन्द्र सारडा, प्रचार मंत्री हेमंत सारडा, संगठन मंत्री वासुदेव लाहोटी, परामर्शदाता लड्डू बंग, सलाहकार आदित्य लोया, शिरीष अगीवाल, विजय बजाज, कार्यकारिणी सदस्य राजेश लोया, आनंद इन्नानी, कुणाल बंग, जगदीश लोया, शिव मूंदड़ा, अभिनव जाखोटिया सहित लक्ष्मीनिवास सत्यनारायण मूंदड़ा, गोविंदलाल जगदीश दरक, मुरलीधर बसंती बाई इन्नानी, अर्जुनदेव मुकेश झंवर, भगवानदास अश्विन लोय व जयनारायण वेणुगोपाल झंवर ने सहयोग प्रदान किया।

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अवसर पर गोविन्द प्रसाद विनोद कुमार बिरला, डॉ. जुगल किशोर जयप्रकाश बंग, हीरालाल बंसीलाल मालानी, किशोर तनुष गांधी, गोवर्धन गिरधारी लाल अट्टल, मुन्नालाल आशीष बंग, श्रीगोपाल विशाल मोदानी, बालमुकुन्द श्यामसुन्दर बंग, संदीप मोदानी, नारायणदास विनीत बाहेती, नथमल हरिकिशन बंग, कमल शुभम भांगडिया, प्रभुदयाल यश जाखोटिया, रामकिशोर कृष्णकांत मोदानी, पन्नालाल हनुमानप्रसाद मोहता, बद्री विशाल रमेश खडलोया, रामविलास आनंद कुमार राठी, लालचंद डागा, प्रकाश पितलिया, रंगदेवी तोष्णीवाल व परिवार, कैलाश राजेश लोया, हेमंत सारडा व अन्य ने सहयोग प्रदान किया।

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