मुट्ठी भर उजियारा

वृंदावन से लौटते हुए उस शाम स्टेशन पर अजीब-सी हलचल थी। यात्रियों की भीड़, चाय की केतलियों की सीटी और लाउडस्पीकर की घोषणाओं के बीच हर कोई अपनी-अपनी यात्रा में व्यस्त था। कहीं कुलियों की आवाज़ें गूँज रही थीं, कहीं बच्चे खिलौनों की दुकानों की ओर खिंचे जा रहे थे। प्लेटफॉर्म पर जीवन अपनी पूरी गति से चल रहा था। इसी भीड़ के बीच मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर जाकर ठहर गई, जो भीड़ में होते हुए भी अकेला लग रहा था।
सफेद साड़ी पहने एक महिला थोड़ी दूर बेंच पर बैठी थी। गले में तुलसी की माला और चेहरे पर गहरी उदासी। वह सामने कहीं शून्य में देख रही थी, जैसे आस-पास की हलचल से उसका कोई संबंध ही न हो। मैं कुछ देर तक उसे देखती रही। न जाने क्यों मन में एक हल्की-सी कसक उठी और उससे बात करने का मन हुआ। इसलिए उठकर उसके पास जाकर बैठ गई और फिर शुरु हुआ बातों का सिलसिला। आप कहाँ से हैं? मैंने धीरे-से पूछा। वह थोड़ा चौंकी, फिर मेरी ओर देखकर बोली- असम से।
उसकी आवाज़ में थकान थी, जैसे बहुत कुछ भीतर दबा हुआ हो। कुछ क्षण हम दोनों चुप बैठे रहे। फिर मैंने कहा-मैं कॉफी लेकर आती हूँ, ज़रा सामान देख लीजिएगा। वह हल्के-से मुस्कुरा दी। मैं पास की दुकान से दो कॉफी लेकर आई। उसने कप को दोनों हाथों से थाम लिया, जैसे उस हल्की-सी गर्माहट में वह अपने भीतर की ठंडक को थोड़ा कम करना चाहती हो। कुछ क्षण हम दोनों चुपचाप कॉफी की भाप को उठते देखते रहे। आप वृंदावन घूमने आई थीं? मैंने पूछा।
हाँ, उसने कहा, बेटा लेकर आया था। कह रहा था कि माँ घर से बाहर निकलो, थोड़ा मन बदल जाएगा। अच्छा किया उसने, मैंने मुस्कुराकर आगे कहा, कभी-कभी जगह बदलने से मन भी हल्का हो जाता है। वह कुछ क्षण चुप रही, फिर कहा- मन का बदलना इतना आसान कहाँ होता है? मैंने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर थकान के साथ एक गहरा खालीपन भी था। कुछ देर बाद मैंने संकोच से कहा- अगर बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ, आप हमेशा ऐसे ही स़फेद कपड़े पहनती हैं?
मेरे प्रश्न पर उसकी आँखों में जैसे कोई पुराना दर्द उतर आया। हमारे यहाँ यही रिवाज़ है। उसने शांत स्वर में आगे कहा, पति के जाने के बाद रंगीन कपड़े नहीं पहनते। गहने भी नहीं, बस यही सादा जीवन। और मन? मैंने धीरे-से पूछा। वह हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची। मन तो कभी-कभी बहुत रंग चाहता है, पर आदत पड़ जाती है, चुप रहने की। मैंने कहा- बच्चे क्या कहते हैं? बहुत समझाते हैं, वह बोली, कहते हैं कि माँ पहले जैसी बन जाओ, हँसा करो, घूमो, पर पता नहीं क्यों सब कुछ जैसे पीछे छूट गया।
मैंने उत्सुकता से कहा- आप पहले कैसी थीं? इस बार वह हल्की-सी हँसी, जैसे कोई पुरानी याद अचानक सामने आ गई हो। बहुत बोलती थी, उसने कहा, घर में हमेशा चहल-पहल रहती थी। त्योहारों पर सबसे ज़्यादा मैं ही सजती थी। लाल साड़ी मुझे बहुत पसंद थी। मेरे पति कहते थे कि लाल रंग तुम पर बहुत अच्छा लगता है। कहकर वह कुछ पल चुप हो गई। उनके जाने के बाद जैसे घर भी शांत हो गया और मैं भी। मैंने कॉफी का घूंट लिया और धीरे-से कहा-शायद इसलिए कि आपने जीवन को यहीं रोक दिया है।
वह मेरी ओर देखने लगी। मैंने उन्हें समझाते हुए कहा- जीवन कभी रुकता नहीं, हम ही कई बार उसे रोक लेते हैं। वह कुछ देर सोचती रही। फिर धीरे-से कहा, आपकी बात सही है, पर कभी-कभी मन ही साथ नहीं देता। तो मन को थोड़ा समझाइए, मैंने मुस्कुराकर कहा। कैसे? उसने पूछा। मैंने कहा- जैसे इस स़फेद साड़ी को ही देखिए। कोई इसे शोक का रंग मानता है, तो कोई शांति का। वह चुप रही। मैंने कहा- हमारे यहाँ साधु-संत भी सादा कपड़े पहनते हैं, पर वे दुःखी नहीं रहते। वे जीवन को स्वीकार करना सीख लेते हैं।
उसने धीरे-से सिर हिलाया और कहा- शायद… मैं स्वीकार करना भूल गई। मैंने हँसते हुए कहा- तो आज से शुरू कीजिए, अपने बच्चों के लिए और अपने ऑलिए भी। वह कुछ पल चुप रही। फिर कहने लगी- मेरे दो बच्चे हैं। दोनों बहुत ध्यान रखते हैं। कभी-कभी सोचती हूँ कि अगर मैं खुश रहूँ तो उन्हें भी अच्छा लगेगा। बस यही सोचिए, मैंने कहा। इस बार उसके चेहरे पर सचमुच एक हल्की-सी मुस्कान उभरी और उसने कहा- कोशिश करूँगी। तभी ट्रेन आने की घोषणा हुई। हम दोनों धीरे-धीरे उठ खड़े हुए। आपसे मिलकर अच्छा लगा। उसने कहा। मुझे भी, मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया।
अचानक वह मेरे पास आई और मुझसे लिपट गई। यह आलिंगन अप्रत्याशित था, पर उसमें एक गहरी आत्मीयता थी, जैसे किसी ने बहुत दिनों बाद अपने भीतर जमा हुआ बोझ थोड़ा हल्का कर लिया हो। धन्यवाद, उसने धीमे-से कहा। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा- अब आगे से खुश रहना। आपके बच्चे ही आपकी सबसे बड़ी त़ाकत हैं। वह मुस्कुराई। इस बार उसकी आँखों में पहले जैसा खालीपन नहीं था। उनमें जैसे कोई छोटी-सी लौ टिमटिमा उठी थी। मैं कोशिश करूँगी। उसने कहा। मैं ट्रेन की ओर बढ़ गई। डिब्बे के दरवाज़े तक पहुँचकर अनायास पीछे मुड़ी।
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वह अभी भी वहीं खड़ी थी, लेकिन अब उसका चेहरा पहले जैसा उदास नहीं लग रहा था। स़फेद साड़ी में लिपटी वह स्त्रा जैसे अचानक थोड़ी हल्की, थोड़ी उजली दिखाई दे रही थी। ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। मैंने सोचा कि कभी-कभी हम किसी के जीवन में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाते। न हम उसके दुःख मिटा सकते हैं, न उसके बीते हुए दिनों को लौटा सकते हैं, लेकिन अगर हमारी कुछ सच्ची बातें, कुछ पल की आत्मीयता किसी के भीतर आशा की एक छोटी-सी लौ जगा सके, तो शायद वही काफी होता है। शायद जीवन को फिर से शुरू करने के लिए इतना ही उजाला पर्याप्त होता है- मुट्ठी भर उजियारा। और कभी-कभी वही मुट्ठी भर उजियारा किसी के पूरे जीवन का रास्ता रोशन कर देता है।
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