धरती का बैकुंठ है बद्रीनाथ धाम

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गंगा सप्तमी के अवसर पर बद्रीनाथ धाम के कपाट विधि-विधान से खोल दिए गए। चार धाम यात्रा में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम शामिल हैं और इसमें बद्रीनाथ धाम एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहाँ भगवान बद्री विशाल का निवास है। यह मंदिर छ महीने के लिए खुलता है और छ महीने बंद रहता है।

इसमें रोचक बात यह है कि जब मंदिर बंद रहता है तो छ महीने तक दीपक जलता रहता है। बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु स्वयं भगवान बद्री विशाल के रूप में विराजमान हैं। गर्भ गृह में उनके साथ माता लक्ष्मी, उद्धव जी और धनपति कुबेर भी रहते हैं। इस मंदिर को बदरी नारायण मंदिर भी कहा जाता है।

पौराणिक कथा

एक बार माता लक्ष्मी भगवान विष्णु से रूठकर बैकुंठ से चली गईं तो भगवान विष्णु ने वर्तमान बद्रीनाथ धाम में आकर तपस्या की। जब लक्ष्मी जी शांत हुईं तो वो श्रीहरि को खोजते हुए, यहां आईं तो देखा कि भगवान विष्णु बदरी के पेड़ों वाले वन में तपस्या कर रहे थे। बदरी का अर्थ है बेड़ का फल। तब माता लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को बदरीनाथ कहा। इस तरह से इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा।

अन्य कथा

बद्रीनाथ में भगवान विष्णु साधना में लीन थे, तो उनको सर्दी से बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने बेरी के वृक्ष का रूप धारण किया। इससे विष्णु जी प्रसन्न हुए और कहा कि इस स्थान को बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा और यहां मेरे साथ आपकी भी पूजा होगी। बद्रीनाथ धाम को भू-बैकुंठ यानी धरती का बैकुंठ कहा जाता है। अलकनंदा नदी के किनारे नर और नारायण पर्वतों के बीच भगवान विष्णु योग मुद्रा में माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं।

बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच में स्थित है। इन पर्वतों को नर और नारायण कहा जाता है। भगवान विष्णु ने अपने अंशावतार नर और नारायण रूप में यहां पर तपस्या की थी। द्वापर युग में नर रूप में अर्जुन और नारायण के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया था। बद्रीनाथ धाम में जब बर्फबारी होती है तो छ माह के लिए मंदिर के कपाट बंद किए जाते हैं और वहां एक अखंड दीपक जलाया जाता है।

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छ माह बाद मंदिर के कपाट खोलने पर वह दीपक जलता हुआ मिलता है। मान्यता है कि इन छ महीनों में देवता भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उस दीपक को जलाए रखते हैं। बद्रीनाथ धाम को लेकर एक कहावत है कि जो जाए बदरी, वो न आए ओदरी। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति एक बार बद्रीनाथ धाम चला जाता है, उसे जीवन और मरण से मोक्ष मिल जाता है, उसे फिर से माता के गर्भ में नहीं जाना पड़ता है। इस कहावत में बद्रीनाथ धाम की पूरी महिमा का वर्णन है। भगवान बद्री विशाल की पूजा और दर्शन करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

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