पुरी धाम में अक्षय तृतीया की दिव्य परंपराएँ
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया माना जाता है। यह सबसे फलदायी तृतीया है। सांस्कृतिक प्रदेश ओड़िशा की सांस्कृतिक नगरी शंखक्षेत्र पुरीधाम में प्रतिवर्ष अनुष्ठित होने वाली अक्षय तृतीया का पौराणिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक महत्त्व अनादिकाल से है। अक्षय तृतीया को युगादि तृतीया भी कहते हैं। अक्षय तृतीया त्रैतायुग तथा सत्युग के शुभारंभ की संदेशवाहिका है। प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया को भगवान बदरीनाथजी के कपाट खोले जाते हैं।
शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को अक्षय तृतीया महात्म्य की कथा सुनाई थी। अक्षय तृतीया को द्वारकाधीश के बाल सखा सुदामा उनसे मिलने के लिए द्वारका गये थे। स्कन्द पुराण के वैष्णव खण्ड के वैशाख महात्म्य में स्पष्ट उल्लेख है कि जो वैष्णव भक्त अक्षय तृतीया के सूर्योदयकाल में पवित्र नदी, महोदधि, पुष्करिणी में स्नान करके भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करता है और भगवान जगन्नाथ की माधुर्य लीला और ऐश्वर्य लीला की कथा सुनता है तो वह मोक्षगामी बनता है।
आस्था, रथ निर्माण और कृषि का शुभ आरंभ
ओड़िशा प्रदेश तथा विशेषकर पुरीधाम में प्रति वर्ष अनुष्ठित होने वाली अक्षय तृतीया की सुदीर्घ तथा गौरवशील परंपरा है। इसे ओड़िया लोक आस्था और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। प्रति वर्ष अक्षय तृतीया को पुरीधाम में एक साथ तीन शुभ कार्य आरंभ किये जाते हैं- पहला, भगवान जगन्नाथ के नये रथों के निर्माण का कार्य पुरी के महाराजा तथा भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक श्रीश्री दिव्य सिंहदेव महाराज के राजमहल श्रीनाहर के समीप रथखला में आरंभ होता है।
दूसरा- विजय प्रतिमा मदनमोहन एवं अन्य देवों की 21 दिवसीय चंदन-यात्रा अनुष्ठित होती है। तीसरा- ओड़िशा के किसान खेतों में जोताई-बोआई का कार्य आरंभ करते हैं जिसके अंतर्गत ओड़िशा के मुख्यमंत्री अपने हाथों से हल चलाते हैं। प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया को पुरीधाम में भगवान श्रीजगन्नाथ को चने की दाल का भोग निवेदित किया जाता है। समस्त सनातनी अपने पूर्वजों की आत्मा की चिरशांति हेतु अक्षय तृतीया को फल-फूल आदि का दान करते हैं।
जगन्नाथ जी की अलौकिक 21 दिवसीय लीला
अक्षय तृतीया की सायं भगवान जगन्नाथ को शर्बत निवेदित किया जाता है। चंदन तालाब को नरेन्द्र तालाब भी कहा जाता है। इन 21 दिनों तक मदनमोहन साधारण मानव की तरह सर्दी-गर्मी का अनुभव करते हैं। वे वैशाख-जेठ मास की भीषण गर्मी से परेशान होकर चंदन तालाब में कुल 21 दिनों तक शीतलता हेतु चंदन का लेप लगाकर मलमलकर स्नान करते हैं।
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नौका विहार करते हैं। कुछ देर तालाब के बीचोंबीच निर्मित अपने चंदनघर में अपराह्न से मध्यरात्रि तक विश्राम करके श्रीमंदिर लौट आते हैं। वे अक्षय तृतीया से श्रीमंदिर की समस्त रीति-नीति के तहत जातभोग संपन्न करके अपराह्न बेला में मदनमोहन, रामकृष्ण, बलराम, पंच पांडव, लोकनाथ, मार्कण्डेय, नीलकण्ठ, कपालमोचन, जम्बेश्वर, लक्ष्मी, सरस्वती आदि को अलौकिक शोभायात्रा के मध्य पुरी नगर परामा कराकर चंदन तालाब लाते हैं। अनुष्ठित होने वाली शोभायात्रा अलौकिक होती है, जिसमें लगातार 21 दिनों तक आगे-आगे परंपरागत बनाटी कौशल प्रदर्शन, तलवार चालन, पाईक नफत्य और भजन-संकीर्तन के मध्य देव प्रतिमाओं को चंदन तालाब लाया जाता है।
अशोक पाण्डेय
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