दावोस का धमाका : कार्नी बनाम ट्रंप !
दुनिया के चकाचौंधभरे मंचों में से एक, स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) हमेशा से अमीरों की गपशप और गरीबों की चिंता का मेला रहा है। लेकिन इस बार, 20 जनवरी, 2026 को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने ऐसा बम फोड़ा कि पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। उनका भाषण नई विश्व व्यवस्था पर था, जो पुरानी अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था को कूड़ेदान में फेंकने जैसा था। एक पूर्व बैंकर से राजनेता बने कार्नी ने बेबाकी से कहा: हम संक्रमण में नहीं, एक फटाव (रप्चर) में हैं। मतलब, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का अंत हो चुका है और यह वापस नहीं आएगी!
कार्नी की मुख्य बातें सुनिए, जैसे कोई पुरानी किताब फाड़कर नई लिख रहे हों। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में वित्तीय संकट, महामारी, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक झगड़ों ने वैश्विक एकीकरण के जोखिमों को उजागर कर दिया है। बड़े देश – अमेरिका, चीन, रूस – अब व्यापार, सप्लाई चेन और वित्त को हथियार बना रहे हैं। आप पारस्परिक लाभ की झूठी दुनिया में नहीं रह सकते, जब एकीकरण आपकी अधीनता का स्रोत बन जाए, कार्नी ने चुटीले अंदाज में कहा। उन्होंने मध्यम शक्तियों – जैसे कनाडा, भारत, ऑस्ट्रेलिया – को चेतावनी दी: पुराने गठबंधनों पर भरोसा मत करो!
स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी का आह्वान: आत्मनिर्भरता अब अनिवार्य
अब स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की जरूरत है – ऊर्जा, खाद्य, महत्वपूर्ण खनिजों और रक्षा में आत्मनिर्भरता! कार्नी ने इसे वैल्यूज-बेस्ड रियलिज्म कहा: मूल्यों पर अडिग रहो, लेकिन दुनिया को वैसी ही स्वीकारो जैसी है! झूठ में जीना बंद करो कहते हुए उन्होंने घोषणा कर डाली कि कनाडा अब दुकान का बोर्ड हटा रहा है, यानी पुरानी व्यवस्था की नाटकबाजी छोड़ रहा है!
इस भाषण की प्रासंगिकता? दुनिया बदल रही है; और तेजी से। अमेरिका-केंद्रित पैक्स अमेरिकाना का युग खत्म हो रहा है, जहाँ संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन या जलवायु समझौते जैसे मंच छोटे देशों को सुरक्षा देते थे। अब शक्ति का खेल है – ट्रंप का ग्रीनलैंड पर दावा हो या चीन का व्यापारिक दबाव! मध्यम शक्तियों के लिए यह एक जागरण है: एकजुट होकर नए गठबंधन बनाओ, वरना टेबल पर न बैठे तो मेन्यू पर हो जाओगे। भारत के लिए यह सीधा सबक है। हम भी मध्यम शक्ति हैं, क्वाड और ब्रिक्स जैसे मंचों में संतुलन साधते हुए। कार्नी का आह्वान आत्मनिर्भर भारत की भी अपरिहार्यता दर्शाता है – चिप्स से लेकर रक्षा तक, हमारी सप्लाई चेन मजबूत होनी चाहिए।
कनाडा की नई रणनीति: AI, ऊर्जा और रक्षा पर बड़ा दांव
ज़ाहिर है कि कार्नी के संबोधन के निहितार्थ गंभीर हैं। आर्थिक रूप से, वैश्विक व्यापार अब सहयोग नहीं, दबाव का हथियार बनेगा। कनाडा ने घोषणा की कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा और खनिजों में भारी निवेश करेगा और रक्षा बजट दोगुना करेगा। इसका मतलब, मध्यम देशों को वेरिएबल जियोमेट्री अपनानी होगी – विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग गठबंधन, जैसे आर्कटिक में डेनमार्क के साथ: या व्यापार में यूरोपीय संघ व ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप। राजनीतिक रूप से, यह बहुपक्षीय संस्थाओं की मौत है। संयुक्त राष्ट्र जैसी जगहें अब सिर्फ बहस क्लब रह जाएँगी। और पर्यावरण? नेट जीरो जैसे लक्ष्य पीछे छूट सकते हैं, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा पहले आएगी।
सयानों की मानें तो इस प्रस्तावित विश्व व्यवस्था में, सकारात्मक रूप से, मध्यम शक्तियाँ मज़बूत होंगी, क्योंकि एकजुटता से वे आर्थिक दबाव का मुकाबला कर सकेंगी और नए गठबंधनों से लाभ उठाएँगी। जैसे, भारत इंडो-पैसिफिक में चीन के दबाव से बच सकता है। लेकिन नकारात्मक प्रभाव भी स्पष्ट हैं: बढ़ती असमानता, क्योंकि छोटे देश और गरीब तबके सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे; व्यापार युद्धों का बढ़ना, जो वैश्विक सप्लाई चेनों को तोड़ेगा; और क्षेत्रीय संघर्षों का खतरा, क्योंकि ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति से यूरोप व कनाडा जैसे सहयोगी दूर होंगे, जबकि रूस-चीन जैसी धुरी मजबूत होंगी।
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टैरिफ की धमकी और कनाडा पर अमेरिका-फर्स्ट का दबाव
परिणामस्वरूप, वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का जोखिम बढ़ेगा, क्योंकि एकीकरण के टूटने से उत्पादकता घटेगी और मुद्रास्फीति बढ़ेगी।वैसे, यह सब तो जब होगा तब होगा। अब का लाख टके का सवाल है: क्या कार्नी ट्रंप के कोपभाजन बनेंगे? उत्तर है: बिल्कुल! अगले ही दिन, 21 जनवरी को ट्रंप ने दावोस में अपना भाषण दिया और कार्नी को सीधा निशाना बनाया। घोषणा की: कनाडा अमेरिका की वजह से जीवित है!
चेतावनी भी दे डाली: याद रखना, मार्क, अगली बार बयान देते हुए! ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर दावा छोड़ने का फ्रेमवर्क भी घोषित किया, लेकिन कनाडा को फ्रीबीज लेने वाला और अहसानफरामोश बताया। मतलब, व्यापारिक दंड या टैरिफ का खतरा मँडरा रहा है। कार्नी की बेबाकी ट्रंप को चुभनी ही थी। यह उनकी अमेरिका फर्स्ट नीति को चुनौती जो थी! कुल मिलाकर, कार्नी का भाषण खतरे की घंटी है कि, दुनिया महाशक्तियों का जंगल बन चुकी है, जहाँ कमज़ोर शेरों का शिकार तय है! भारत को इससे सीखना चाहिए: अपनी शक्ति बढ़ाओ, गठबंधन चुनो, लेकिन मूल्यों से समझौता मत करो। ट्रंप जैसे दबंगों से डरो मत; तैयार रहो। दावोस ने साबित किया – विश्व व्यवस्था बदल रही है और हम सब इसके हिस्सेदार हैं।
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