अवतरण दिवस (मनहरण घनाक्षरी छंद)
कठिन कुठार हाथ भस्म का त्रिपुण्ड माथ,
धनुष प्रचंड द्विति द्विजता सुहावनी।
कसे पृष्ठ तूण में भरे कराल व्याल वाण,
आँख रक्त कुंभन-सी भीषण डरावनी।।
हूकते हुँकार मारि भीति भरें राजन के,
चाबुक चपेटन की चीख हैं भयावनी।
रद-पुट दो फड़कें ज्यों भौंहें हैं भड़कीली,
सिंह सब नवाये शिर भृगुपति की छावनी।।
चलते शृगाल दरबार मध्य केहरि ज्यों,
ऐसे निर्भीक श्री ऋचीक शिष्य राम हैं।
खटक खड़ाऊँ की भय का प्रवाह भरे,
क्षत्रिय के क्षेत्र छिन्न-भिन्न अविराम हैं।।
कोप है कराल काल कीर्तित कुठार धरे,
बज्र से प्रचंड अंग-अंग कोप धाम हैं।
काँपते नरेश देश-देश के अनेक खड़े,
देखि अहिभूषन को काँपते ज्यों काम हैं।।
क्षत्रिय भयातुर हैं भीषण कुठार देख,
जैसे सूर्य तेज से उलूक चौंधिया गए।
उठ-उठ नवाय शीश पितृ का प्रमाण देते,
भृगुपति दें चाबुक चपेट बिलबिला गए।।
जनक विदेह हो सदेह उठे गद्दी से,
मंत्रिन समेत हो सचेत शिर झुका गए।
इतने में रेणुकेय करके हुँकार दीर्घ,
खंडित पिनाक देख और तिलमिला गए।।

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