प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित
हर तरफ से हो रहा प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित
असंख्य आपदाएं विपदाएं झेल रहे हैं किसान
कींटों का बिछ रहा जाल प्रदूषित वातावरण
मौसम की उलट-फेर से दुःखद हुए हैं दिनमान।
गर्मी के मौसम में बरस रहे हैं मोटे-मोटे ओले
फसलों को हो रहा है भारी-भरकम नुकसान
बड़ी मात्रा में स्वास्थ्य संपदा अन्न को हुई हानि
मगर चुप है एहसान फरामोश निर्दयी इंसान।
पैसों की करेगा खेती उसी से भरेगा सबका पेट
मति भ्रमित महत्वाकांक्षाओं का जड़त्व व्याख्यान
प्रकृति को देकर चुनौती लापरवाह बन बैठा ये
कर रहा है अंजानी समस्याओं का नित आान।
फट रहे कहीं बादल कहीं अतिवृष्टि कहीं सूखा
डोल रही धरती भूकंप कहीं धंस रही है ज़मीन
रोएं बेजुबान पशु-पक्षी पेड़-पौधे कहे दर्द किसे
प्रकृति की नाराज़गी ने कर दिया जीवन गमगीन।
ओ मूर्ख! कितना भी उड़ ले हवा में हो मदहोश
काल्पनिक अहम के जग में हो आनंद तल्लीन
प्रकृति से माँग ले तू अपने किए गुनाहों की म़ाफी
वरना हो जाएगा तेरा अस्तित्व एक दिन विलीन।

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