दोहरे बम विस्फोट मामले में आरोपियों की मौत की सजा बरकरार
हैदराबाद, देशभर में सनसनी फैलाने वाले दिलसुखनगर दोहरे बम विस्फोट के मामले में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने आज ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपियों की मौत की सजा को बरकरार रखा। तेलंगाना उच्च न्यायालय के इतिहास में पहली बार एक साथ पाँच आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई। गौरतलब है कि 21 फरवरी, 2013 को दिलसुखनगर के ए1 मिर्ची सेंटर और दिलसुखनगर स्थित 107 बस स्टॉप के पास सिलसिलेवार तरीके से दो बम विस्फोट किए गए थे।
इस बम विस्फोट में 18 लोगों की मौत हुई और 131 लोग घायल हो गए थे। इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकवादी संगठन के आतंकियों ने कुकर में बम विस्फोट किया था। इस घटना को लेकर दो आपराधिक मामले दर्ज किए गए और मामलों की जाँच-पड़ताल राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए को सौंप दी गई थी। इस मामले को लेकर एनआईए की अदालत ने 19 अक्तूबर, 2016 को एनआईए की अदालत ने पाँच आरोपियों असदुल्लाह अख्तर, यासिन भटकल, तहसीन अख्तर, जिया उर रहमान और एजाज शेख को अभियुक्त करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी।
19 अक्तूबर, 2016 को मौत की सजा निर्धारित करने के लिए एनआईए की अदालत ने तेलंगाना उच्च न्यायालय को पत्र लिखा था। इस पत्र के आधार पर चार अप्रैल, 2015 को उच्च न्यायालय ने मौत की सजा की पुष्टि की थी। इस दौरान एनआईए की अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपियों की ओर से उच्च न्यायालय में अपील याचिका दायर की गई।
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एनआईए कोर्ट की मौत की सजा पर हाईकोर्ट की मुहर
इस याचिका पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस के. लक्ष्मण और जस्टिस पी. श्रीसुधा की खण्डपीठ ने सुनवाई पूर्ण कर ली और आज ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पाँचों आरोपियों के खिलाफ एनआईए की अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा। गौरतलब है कि इस मामले को 14 मार्च, 2014 को एनआईए को स्थानांतरित कर दिया गया और एनआईए की ओर से मामले के संबंध में पहला आरोप-पत्र दायर किया गया।
इसके बाद 15 सितंबर, 2014 और 6 जून, 2015 को दो और अनुबंधित आरोप-पत्र दायर किए गए। 524 गवाहों के बयान लेने के बाद 157 गवाहों को अदालत में पेश किया गया। 16 जुलाई, 2015 को मामले के संबंध में आरोप तय किए गए। सुनवाई के दौरान सबूत के रूप में 507 दस्तावेज और 201 सामग्री पेश की गई। आरोपियों के खिलाफ 13 अक्तूबर, 2016 को आरोपी साबित किए गए और 19 अक्तूबर, 2016 को आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई।
आरोपियों के खिलाफ दायर किए गए आरोप-पत्र में यह स्पष्ट किया गया कि आरोपियों ने सोची-समझी साजिश के तहत अधिक भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में बम विस्फोट किया, जिससे कि अधिक संख्या में लोगों की मौत हो सके। मामले की सुनवाई के दौरान बताया गया कि यह घटना बाहरी शक्तियों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से की गई साजिश है।
इस बम विस्फोट में 18 लोग मारे गए और 131 लोग घायल हुए, जिसमें एक गर्भवती महिला भी शामिल थी, जो अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ मारी गई। जाँच-पड़ताल से इस बात का खुलासा हुआ कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ते हुए आरोपियों ने सोची-समझी साजिश के तहत बम विस्फोट को अंजाम दिया। इस प्रकार बम विस्फोट को अंजाम देकर मासूम लोगों को मारकर देश की एकता, अखण्डता और सार्वभौमिकता को ठोस पहुँचाना था। देश में असुरक्षा की भावना को उत्पन्न करना इनका लक्ष्य था।
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