गरीबों के खिलाफ काम कर रहा है वक्फ बोर्ड

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने दारुशिफा इबादत खाने का अधिग्रहण करने और मुसलमानों के सभी वर्गों के साथ एक समिति बनाने के अपने आदेश को लागू न करने के लिए वक्फ बोर्ड की कड़ी आलोचना की।

अदालत ने सवाल उठाया कि वक्फ बोर्ड ने पिछले वर्ष 29 दिसंबर को दिए गए फैसले को लागू क्यों नहीं किया। समिति में सभी समुदायों को अवसर प्रदान करने के आदेश का क्रियान्वयन न किए जाने पर अदालत ने रोष जताया।

अदालत ने इबादत खाने के वक्फ के चयन पर विवाद को समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके तहत सभी समुदायों को लेकर एक समिति बनाने के आदेश का क्रियान्वयन न होना यह बताता है कि वक्फ बोर्ड गरीब मुस्लिम समुदाय के खिलाफ काम कर रहा है।

वक्फ बोर्ड के आचरण पर असंतोष

अदालत ने वक्फ बोर्ड के पूर्व समिति सदस्य मीर हस्नैन अली खान द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें इबादत खाने को अपने अधीन करने और शिया, इमामिया, अशरी, अकबरी और उसूली के समान प्रतिनिधित्व के साथ एक प्रबंधन समिति बनाने के फैसले की समीक्षा की माँग की गई थी। इसके संबंध में न्यायाधीश नागेश भीमापाका ने गुरुवार को तीस पन्नों का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

न्यायाधीश ने समीक्षा में याचिकाकर्ता के साथ-साथ वक्फ बोर्ड के आचरण पर असंतोष जताया। इस अवसर पर उन्होंने अपने जूते उतारकर अदालत में कुरान की आयतें पढ़ीं और अपने फैसले में कुरान में निहित पवित्र सिद्धांतों का हवाला दिया, जैसे किसी की संपत्ति को अवैध रूप से जब्त करने की कोशिश न करना और सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देकर अवैध लाभ प्राप्त करने की कोशिश न करना। उन्होंने वक्फ बोर्ड के अलावा याचिकाकर्ता पर भी कुरान की भावना की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

वक्फ की स्थापना 1953 के बाद हुई थी। 8 वक्फ अपने वारिसों को नामित व्यक्ति के रूप में चुन सकते हैं। हालाँकि जब उन्होंने नामित व्यक्तियों की नियुक्ति नहीं की, तो सरकार ने 1994 में कार्रवाई जारी की। वक्फ अधिनियम की धारा 12 के तहत वक्फ बोर्ड ने इबादत खाने के प्रबंधन के लिए जून-2023 में 10 सदस्यीय समिति का गठन किया। हालाँकि उनका वक्फ से कोई संबंध नहीं है।

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याचिका खारिज, समिति गठन का रास्ता साफ

इसके बाद सरकार द्वारा जारी कार्रवाई को लेकर चुनौती देते हुए याचिकाएँ दायर की गई। उच्च न्यायालय ने इससे पहले वक्फ और नामितों से असम्बद्ध एक व्यक्ति को मुत्तावल्ली समिति का अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद समिति को भंग कर दिया था। समीक्षा याचिका दायर करने वाले व्यक्ति ने 1953 के वक्फ की विरासत को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया। नए साक्ष्य होने का दावा करते हुए प्रस्तुत दस्तावेजों का इस मामले से कोई संबंध नहीं है। इसके अलावा उन्होंने तथ्यों को दबा दिया है। कोई ठोस तथ्य पेश नहीं किए गए।

फैसले में कहा गया कि याचिकाकर्ता अच्छे इरादे से नहीं आया था, बल्कि वे तथ्यों को दबाकर अदालत में आए। ऐसा करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। ऐसी स्थिति में न्यायालयों की जिम्मेदारी बहुत बड़ी हो जाती है। अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग अदालत की अवमानना माना जाएगा। वक्फ बोर्ड ने यह नहीं बताया कि उसने 1994 में धारा 29 के बजाय वक्फ अधिनियम की धारा 42 के तहत आदेश जारी किए थे।

इसक अलावा वक्फ बोर्ड ने स्वीकार किया कि 1953 से वक्फ के लिए उत्तराधिकारी समिति के अस्तित्व के बारे में कोई जानकारी नहीं है। क्योंकि मुत्तावली के कार्यालय में कोई उत्तराधिकार या रिक्ति नहीं है और वक्फ डीड के प्रावधानों के अनुसार उत्तराधिकारियों की नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है। इसीलिए मुस्लिम समुदाय के भीतर शिया, ईमामियाँ और इस्हाना अशरी समुदायों के बराबर प्रतिनिधित्व के साथ एक प्रबंधन समिति नियुक्त की जा सकती है।

याचिकाकर्ता ने पिछले फैसले की समीक्षा करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है। न्यायाधीश नागेश भीमापाका ने 30 पन्नों के फैसले में कहा कि इस याचिका में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है और इसलिए समीक्षा याचिका को खारिज किया जा रहा है।

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