दिव्य-जीवन जीने की कला सिखाता महाराज यदु और तपोमय दत्तात्रेय का संवाद

पृथ्वी का आदर करना हमारा नैतिक दायित्व है। उसके प्रति कृतज्ञ रहना हमारा धर्म है। मनुष्य के जीवन में यदि धैर्य, सहनशीलता, उदारता और परोपकार जैसे गुण विकसित हों, तो उसका जीवन स्वतः ही शांति और आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। आज परिवार, समाज और राष्ट्र में जहां कहीं भी कलह और अशांति व्याप्त है, उसका मूल कारण इन सद्गुणों का अभाव ही है।

धर्म शास्त्रों के अनुसार, यह संसार इंद्रियजन्य नहीं, अपितु आत्मजन्य है। इंद्रियां केवल साधन हैं, साध्य नहीं। क्योंकि उनमें उनका स्वयं का कोई प्रकाश नहीं है। वह तो ईश्वर की सत्ता से प्रकाशित हैं। वास्तविक ज्ञान अंतरात्मा में प्रसुप्त है, जो प्रखर चिंतन से वैसे ही प्रकट होता है, जैसे अरणि-मंथन से अग्नि। आत्म-साक्षात्कार ही वह विद्या है, जो मनुष्य को दिव्य और शांत जीवन जीने की कला सिखाती है।

श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में महाराजा यदु और भगवान दत्तात्रेय के मध्य एक संवाद हुआ, जिसमें जीवन-प्रबंधन और दर्शन के सूत्र सन्ननिहित हैं। एक बार महाराज यदु की राजसभा में महर्षि अत्रि नंदन अवधूत दत्तात्रेय का शुभागमन हुआ। उनके तेजोमय, तपोमय, ज्ञानमय एवं आनंदमय स्वरूप को देखकर यदु ने उनसे पूछा-

त्वं ही नः पृष्ठभूमिं ब्रह्मन्नात्मन्यान्दकारणम् ।

ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ।।

अर्थात- हे ब्राह्मण! आप पुत्र, स्त्री और धनादि संसार के स्पर्श से सहज ही विमुक्त हैं। जहां समस्त संसार कामनाओं और लोभ की दावानल में दग्ध हो रहा है, वहां आप इस अशांत मरुस्थल में आत्मानंद के शीतल सरोवर की धन्य तृप्त और प्रसन्न कैसे हैं? आपकी इस निर्विकार शांति और अनिर्वचनीय आनंद का रहस्य क्या है?

यह सुनकर ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेय महाभाग ने कहा- हे राजन! मैंने अपनी सात्विक बुद्धि से चौबीस गुरुजनों का आश्रय लिया है, जिनके सहज गुण-धर्म एवं स्वभावादि से मैंने शिक्षा ग्रहण की है, उसी के अमोघ प्रभाव से मैं सदा तृप्त और ब्रह्मानंद में निमग्न रहता हूं, जिनके नाम हैं-

पृथिवी वायुराकाशमापो ऽ ग्निश्चन्द्रमा रविः ।

कपोतो ऽ जागरः सिन्धुः पतंगो मधुकृद् गजः ।।

मधुहा हरिणो मीनः मालदीव कुरो ऽर्भकः ।

कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ।।

अर्थात- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुकुर पक्षी, बालक, कुंआरी कन्या, बाप, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट। हे राजन ! मैंने देवी पृथ्वी से धैर्य, सहनशीलता और क्षमा का मह-ान पाठ सीखा है। धैर्य को शक्ति बनाना, क्षमा को आभूषण बनाना और परोपकार को जीवन का लक्ष्य बनाना।

पृथ्वी हर आघात सहती रहती है, किन्तु न तो प्रतिशोध करती है और न ही आर्तनाद। मौन रहकर सब कुछ सहन करते हुए भी सबको जीवन देती है। इस संसार में समस्त प्राणी अपने-अपने प्रारब्ध के अधीन कर्मरत हैं। समय, परिस्थिति और अज्ञानतावश जाने-अनजाने में एक-दूसरे पर आक्रमण कर बैठते हैं। ऐसे में धीर पुरुष का कर्तव्य है कि वह उनकी विवशता को समझे। न तो अपना धैर्य खोए और न ही क्रोध के वशीभूत हो।

जैसे पृथ्वी सब सहकर भी अपने मार्ग से विचलित नहीं होती, वैसे ही विवेकी मनुष्य को भी अपने लक्ष्य-पथ पर अडिग रहना चाहिए। पृथ्वी के ही अंग पर्वत हैं, जिनके अंचल से जीवनदायिनी नदियां प्रवाहित होती हैं। पृथ्वी से ही वृक्ष, लताएं और समस्त वनस्पति जन्म लेती है। पर्वत और वृक्ष दोनों परोपकार के मूर्तिमान प्रतीक हैं। वे स्वयं कठोरता और तपस्या में स्थित रहकर दूसरों को जल, छाया, फल, औषधि और आश्रय प्रदान करते हैं। उनसे मैंने यह सीखा कि श्रेष्ठ जीवन वही है, जो दूसरों के हित के लिए समर्पित हो।

पृथ्वी रत्नमयी है, वह अन्न देती है, जल देती है और समस्त जीवों के जीवन का आधार बनती है। वास्तव में पृथ्वी हमारी माता है। उसका प्रत्येक कण जीवन को पोषित करता है। पर्वत और वृक्ष जैसे उसके विकार हमें यह सिखाते हैं कि उनका जन्म ही परहित के लिए हुआ है। साधु पुरुष को चाहिए कि वह उनकी शिष्यता स्वीकार करे निःस्वार्थ सेवा का जीवन में उतारे।

पृथ्वी का आदर करना हमारा नैतिक दायित्व है। उसके प्रति कृतज्ञ रहना हमारा धर्म है। मनुष्य के जीवन में यदि धैर्य, सहनशीलता, उदारता और परोपकार जैसे गुण विकसित हों, तो उसका जीवन स्वतः ही शांति और आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। आज परिवार, समाज और राष्ट्र में जहां कहीं भी कलह और अशांति व्याप्त है, उसका मूल कारण इन सद्‌गुणों का अभाव ही है।

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