पृथ्वी दिवस : पृथ्वी के साथ छल-बल ठीक नहीं
पृथ्वी का संकट दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। आज विकास के नाम पर प्रति वर्ष 7 करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश होने से प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। वनों के विनाश से वातारण जहरीला हो चुका है। प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
आज पृथ्वी दिवस है। हर वर्ष 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्थन प्रदर्शित करने के लिए मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 में पृथ्वी दिवस की थीम हमारी शक्ति, हमारा ग्रह है। यह थीम मानव समाज को अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करती है। पृथ्वी दिवस का शुभारंभ अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रुप में किया गया जो आज संसार के 192 देशों के करोड़ों लोगों द्वारा मनाया जाता है।
सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के मन में पृथ्वी दिवस का विचार तब आया जब उन्होंने देखा कि सेंट बारबरा तेल रिसाव, प्रदूषण उगलती फैक्ट्रियां, पावर प्लांटों से निकलते खतरनाक तत्व, नगरीय कचरे और मलबे से पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने इस ओर अमेरिकी जनमानस का ध्यान आकर्षित करते हुए 22 अप्रैल 1970 को पृथ्वी दिवस आयोजित कर आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत की। लेकिन त्रासदी है कि एक ओर हम सभी पृथ्वी दिवस के नाम पर पर्यावरण सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए नए-नए कानून गढ़ते हैं वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।
नतीजा सामने है। पृथ्वी का संकट दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। आज विकास के नाम पर प्रति वर्ष 7 करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश होने से प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला हो चुका है। प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
वीएसएलएस तत्वों से ओजोन परत को बढ़ता खतरा
नेचर जिओसाइंस की मानें तो ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इन खास किस्म के अत्यंत अल्प जीवी तत्वों (वीएसएलएस) का ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी 90 फीसदी है। विडंबना यह है कि ओजोन परत की सुरक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के मांट्रियाल प्रोटाकॉल में इन तत्वों पर नियंत्रण की कोई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है।
गौरतलब है कि दुनिया के 20 सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों के बीच ओजोन परत के क्षरण को रोकने के लिए 16 सितंबर, 1987 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संधि हुई जिसे मांट्रियाल प्रोटाकॉल नाम दिया गया। उसका मकसद ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार गैसों एवं तत्वों के इस्तेमाल पर रोक लगाना था। लेकिन इस दिशा में अभी तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हुई है। एक आंकड़े के मुताबिक अब तक वायुमण्डल में 38 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि और 26 लाख टन ऑक्सीजन समाप्त हो चुकी है।
अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापमान में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है अगर उस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। आज जब मनुष्य 48 डिग्री सेल्सियस की गर्मी सह नहीं पा रहा है तो 60 डिग्री सेल्सियस गर्मी कैसे बर्दाश्त करेगा? नतीजा यह होगा कि सूर्य की किरणें कैंसर जैसे भयंकर रोगों में वृद्धि करेगी। कहीं सूखा पड़ेगा तो कहीं गरम हवाएं चलेंगी। कहीं भीषण तूफान होगा तो कहीं बाढ़ की विनाशलीला मचेगी।
तापमान बढ़ने से हिमखंड पिघलने का बढ़ता खतरा
एक अनुमान के मुताबिक यदि पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो जाए तो आर्कटिक एवं अंटार्कटिका के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएंगे। इससे समुद्र के जल स्तर में 10 इंच से 5 फुट तक वृद्धि हो सकती है। इसका परिणाम यह होगा कि समुद्रतटीय नगर समुद्र में डूब जाएंगे। भारत के मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम, कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्र में होंगे। इसी तरह न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, पेरिस और लंदन आदि बड़े नगर भी जलमग्न हो जाएंगे।
याद होगा पर्यावरण के संरक्षण के लिए 5 जून 2007 का सबसे ज्वलंत विषय पिघलती बर्फ था। इस पर मुख्य अंतरराष्ट्रीय आयोजन नॉर्वे के ट्राम्से में संपन्न हुआ और दुनिया भर में ग्लोबल आउटलुक फार आइस एंड स्नो की शुरुआत हुई। पर्यावरण के साथ खिलवाड़ का सबसे घातक असर ध्रवीय क्षेत्रों पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय अनुपात को देखते हुए उत्तरी ध्रुव क्षेत्र दोहरी तेजी से गरम हो रहा है। उत्तरी ध्रुव समुद्र में फैली स्थायी बर्फ की मोटी परत कम हो रही है।
सदियों से बर्फ के मजबूत चादर में ढके क्षेत्र पिघल रहे हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब 30 पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई आधे मीटर से ज्यादा कम हो गयी है। वैज्ञानिकों को मानना है कि इसके लिए मुख्य रुप से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर 2 से 5 किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। इसके अलावा हिमालय के 76 फीसदी ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं।
गंगोत्री ग्लेशियर के सिकुड़ने से बढ़ी पर्यावरण चिंता
कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ते ग्लेशियर का एक उदाहरण है। अनुमानित भूमंडलीय तापन से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित होने की संभावना बढ़ गई है। कई जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। जातियों के वितरण में इन परिवर्तनों का जाति विविधता तथा पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं इत्यादि पर असर पड़ेगा। पृथ्वी पर करीब 12 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण संभवत ग्रीन हाउस प्रभाव ही था।
निश्चित रुप से मनुष्य के विकास के लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का दोहन आवश्यक है। पर उसकी सीमा निर्धारित होनी चाहिए। लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा है। विकास के लिए बिजली आवश्यक है। लेकिन जिस तरह बिजली उत्पादन के लिए नदियों के सतत प्रवाह को रोककर बांध बनाया जा रहा है उससे खतरनाक पारिस्थितिकीय संकट उत्पन्न हो गया है। जल का दोहन स्रोत सालाना रिचार्ज से कई गुना बढ़ गया है।
पेयजल और कृषि जल का संकट गहराने लगा है। भारत की गंगा और यमुना जैसी अनगिनत नदियां सूखने के कगार पर हैं। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बहाने के कारण क्रोमियम और मरकरी जैसे घातक रसायनों से नदियों का पानी जहर बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों की मानें तो जल संरक्षण और प्रदूषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले 200 सालों में भूजल स्रोत सूख जाएगा।
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पर्यावरण सम्मेलनों के बावजूद ठोस अमल की कमी
नतीजतन मानव को मौसमी परिवर्तनों मसलन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीन हाउस प्रभाव, भूकंप, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखा जैसी विपदाओं से जूझना होगा। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर 1972 में स्टाकहोम से लेकर अब तक कई सम्मेलन हो चुके हैं लेकिन त्रासदी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की पहल पर ईमानदारी से अमल नहीं हो रहा है। लेक सेक सम्मेलन 1949 में इस बात पर बल दिया गया था कि प्रकृति के उपकरण एक नैसर्गिक बपौती के रुप में है जिन्हें शीघ्रता से नष्ट नहीं करना चाहिए। इसी तरह स्टाकहोम सम्मेलन 1972 में मानवीय पर्यावरण पर घोषणा हुई।
सैद्धांतिक रुप से पृथ्वी के प्राकृतिक द्रव्यों जिनमें वायु, पानी, भूमि तथा पेड़-पौधे शामिल हैं, को वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लिए सावधानीपूर्वक तथा उपयुक्त योजना तथा प्रबंध द्वारा सुरक्षित रखने पर बल दिया गया।

1992 के रियो शिखर सम्मेलन में कहा गया कि स्थायी विकास के सभी सरोकारों का केंद्र-बिंदु मानव जाति ही है और उसे प्रकृति के साथ पूर्ण समरसता रखते हुए स्वस्थ एवं उत्पादनशील जीवन जीना चाहिए। वर्ष 2023 में विश्व पृथ्वी दिवस की थीम हमारे ग्रह में निवेश करें रखी गई ताकि भावी पीढ़ी पृथ्वी समेत अन्य ग्रहों के संरक्षण को लेकर जागरुक हो। इसी तरह 2024 में विश्व पृथ्वी दिवस की थीम ग्रह बनाम प्लास्टिक थी ताकि पृथ्वी को प्लास्टिक से मुक्त रखा जाए। लेकिन ये सभी सिद्धांत कागजों तक ही सीमित हैं। सच तो यह है मानव आज भी अपने दुराग्रहों के साथ खड़ा है और प्रकृति से उसका खिलवाड़ पहले से भी ज्यादा जघन्य हो गया है।
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