वोट चोरी के आरोपों की चुनाव आयोग गंभीरता से जांच करे
राहुल गांधी ने मतदाता सूची में अनियमितताओं के जो आरोप लगाये हैं, उनकी जांच होना भी आवश्यक है। इन आरोपों पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया बेतुकी प्रतीत हो रही है, जिससे उसकी अपनी ही छवि खराब हो रही है। अगर आरोप अनुमानित भी हैं, तो भी उनकी जांच होनी चाहिए, वह लोकसभा में विपक्ष के नेता द्वारा लगाये जा रहे हैं। राहुल गांधी से शपथपूर्वक औपचारिक घोषणापत्र मांगकर चुनाव आयोग अपनी ही फज़ीहत करा रहा है।
मतदाता सूची में गड़बड़ी है, अब इसके प्रमाण निरंतर प्रकाश में आ रहे हैं- कहीं एक घर में 250 मतदाता पंजीकृत हैं तो कहीं 10 बाई 15 फीट के कमरे में 80 मतदाता रह रहे हैं और वह भी अलग-अलग जातियों व क्षेत्रों के। कहीं बड़ी संख्या में मकानों का नंबर शून्य लिखा है, तो कहीं पिता का नाम एफजीएचआई लिखा है या एक ही व्यक्ति को दो एपिक कार्ड जारी किये हुए हैं; कहीं फॉर्म 6 पर 70-वर्षीय महिला को मतदाता बनाया हुआ है, जबकि इसका संबंध पहली बार के नये मतदाता से है, तो कहीं फोटो ऐसा लगाया हुआ है कि माइक्रोस्कोप से भी दिखायी न दे …इस कि़स्म की अनेक त्रुटियां हैं, जिनको त्वरित सुधारने की ज़रूरत है ताकि मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया में विश्वास बना रहे।
लेकिन चुनाव आयोग क्या कर रहा है? वह कहीं वोट बढ़ा देता है, कहीं वोट घटा देता है और सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में कहता है कि बिहार में मतदाता सूची से बाहर किये गये 65 लाख लोगों की न तो सूची शेयर करेगा और न ही यह बताने के लिए बाध्य है कि उनका नाम किस वजह से सूची से हटाया गया है। यह जानकारी अगर चुनाव आयोग नहीं देगा, तो फिर कौन देगा?
वोट चोरी पर राहुल के साक्ष्यों संग आरोप
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अपनी साईट पर जो बिहार की डिजिटल मतदाता सूची अपलोड की थी उसे हटाकर ऐसे फॉर्मेट में सूची अपलोड की है, जिसे पढ़ना व डाउनलोड करना लगभग असंभव है। इससे चुनाव आयोग के इरादों पर शक गहरा ही होता है, विशेषकर इसलिए कि वोट चोरी का आरोप लगाते हुए जब विपक्ष के 300 सांसदों ने 11 अगस्त 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिलने के लिए समय मांगा, तो उन्होंने जगह की तंगी का हवाला देते हुए केवल 30 सांसदों से ही मुल़ाकात करने को कहा।
लेकिन यह भी न हो सका; क्योंकि यह सांसद जब संसद भवन से निर्वाचन सदन की तरफ मार्च करते हुए जा रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और दो घंटे बाद छोड़ा। क्या मज़ाक है, देश की राजधानी में इतनी जगह भी नहीं है कि ज्ञानेश कुमार 300 सांसदों से एक साथ मुलाकात कर सकें? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल के दिनों में दो मुख्य आरोप लगाये हैं।
एक, उन्होंने पिछले साल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर मैच फिक्सिंग के आरोप लगाये। दो, उन्होंने 2024 कर्नाटक लोकसभा चुनाव में वोट चोरी का आरोप लगाया। महाराष्ट्र से संबंधित आरोप मोटे ब्रश से पेंट किया गया था, जो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से आरंभ होकर मतदान के आंकड़ों में वृद्धि तक पहुंचा। लेकिन कर्नाटक से संबंधित आरोप लगाने से पहले राहुल गांधी ने गहरी पड़ताल की और साक्ष्यों के आधार पर आरोप लगाये।
राहुल का दावा: 1 लाख से अधिक जाली वोट
भारत के चुनावी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब ठोस साक्ष्यों के साथ आरोप लगाये गये। काफी जद्दोजहद के बाद चुनाव आयोग बैंगलुरु सेंट्रल लोकसभा सीट के महादेवपुरा सेगमेंट की मतदाता सूची राहुल गांधी को देने के लिए तैयार हुआ और वह भी लाखों कागजों पर आधारित, जबकि वह डिजिटल भी दी जा सकती थी। इन कागजों की जांच करने में राहुल गांधी की टीम को लगभग छह माह का समय लगा।
अगर यह डिजिटल फॉर्मेट में दी जाती तो यह काम एक दिन में ही हो जाता। यह भी सोचने का विषय है कि चुनाव आयोग ने डिजिटल फॉर्मेट में सूची देने की बजाय टनभर कागज़ में क्यों दिए? क्या वह चाहता था कि कोई जांच कर ही न पाये? बहरहाल, 7 अगस्त 2025 को डाटा पॉइंट प्रेजेंटेशन के रूप में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में, अपने अध्ययन का हवाला देते हुए, राहुल गांधी ने दावा किया कि बीजेपी ने बैंगलुरु सेंट्रल की सीट 32,707 वोटों से जीती, जबकि उसके पक्ष में 1,00,250 जाली वोट पड़े थे।
उनके अनुसार जाली वोट पांच श्रेणियों में थे- डुप्लीकेट मतदाता (11,965), नकली/अवैध पते (40,009), एक ही पते पर थोक के भाव में मतदाता (10,452), मतदाताओं के अवैध फोटो (4,132) और पहली बार वोटर बनने के लिए फॉर्म 6 का दुरूपयोग (33,692)। फाइल दिखाते हुए, उन्होंने उदहारण से बताया कि सीट के अलग-अलग बूथों पर लोगों ने कई-कई बार मतदान किया है, जबकि मतदाता सूचियों पर उनके पते स्ट्रीट 0, हाउस नंबर 0 थे।
मतदाता सूची धांधली पर जांच की मांग
उन्होंने कहा कि एक पते पर तो 80 मतदाता थे और एक जगह एक कमरे के मकान में 50 मतदाता पंजीकृत थे। जब शोधकर्ताओं ने इसे क्रॉस चेक करने का प्रयास किया, तो उनके विरुद्ध हिंसा की गई या साफ इंकार कर दिया कि इस नाम का यहां कोई नहीं रहता। राहुल गांधी के अनुसार वोट चोरी लोकतंत्र पर हमला है। यह बहुत गंभीर आरोप हैं। इनकी गहराई से जांच होनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में फ्री एंड फेयर इलेक्शन तभी हो सकते हैं, जब मतदाता सूची पर कोई संदेह न हो और 18 वर्ष से ऊपर के किसी भी भारतीय नागरिक का नाम उसमें से गायब न हो।
लेकिन इन आरोपों की जांच करने या मतदाता सूची की कमियों को दूर करने की बजाय चुनाव आयोग राहुल गांधी से लिखित में हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र मांग रहा है और वह भी अपने द्वारा बनाये गये फॉर्मेट में जोकि मतदाता सूची में किसी का नाम जोड़ने या घटाने के लिए दिया जाता है। क्या राहुल गांधी मतदाता सूची में किसी का नाम शामिल करने या निकालने की मांग कर रहे हैं? नहीं।
वह तो यह कह रहे हैं कि जिस मतदाता सूची के आधार पर 2024 का लोकसभा चुनाव कराया गया और जिसे चुनाव आयोग ने स्वयं उन्हें दिया उसमें धांधली हुई है, जिसकी जांच होनी चाहिए? इसलिए चुनाव आयोग की राहुल गांधी से मांग अनावश्यक है या वह मामले को उलझाने के लिए ऐसा कर रहा है। गौरतलब है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि उन्होंने उन 18,000 मतदाताओं के शपथ पत्र चुनाव आयोग को दिये थे, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिये गये थे, लेकिन चुनाव आयोग ने अभी तक उसका कोई संज्ञान नहीं लिया है।
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राहुल के आरोपों पर जांच जरूरी: राठौर
मतदाता सूची शुद्ध नहीं हैं, इसलिए समय-समय पर उनकी समीक्षा होती रहनी चाहिए, लेकिन बिहार में जो एसआईआर चल रही है, वह बहुत खराब उदहारण है, क्योंकि यह विधानसभा चुनाव से पहले साक्ष्य का बोझ मतदाताओं पर डाले हुए है और अव्यवहारिक टाइमलाइन निर्धारित किये हुए है। वैसे इस कि़स्म की एक्सरसाइज समय-समय पर होना ज़रूरी है, लेकिन जल्दबाजी में नहीं जैसा कि बिहार में हो रहा है। राहुल गांधी ने मतदाता सूची में अनियमितताओं के जो आरोप लगाये हैं, उनकी जांच होना भी आवश्यक है।
इन आरोपों पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया बेतुकी प्रतीत हो रही है, जिससे उसकी अपनी ही छवि खराब हो रही है। अगर आरोप अनुमानित भी हैं, तो भी उनकी जांच होनी चाहिए, वह लोकसभा में विपक्ष के नेता द्वारा लगाये जा रहे हैं। राहुल गांधी से शपथपूर्वक औपचारिक घोषणापत्र मांगकर चुनाव आयोग अपनी ही फज़ीहत करा रहा है, जबकि पिछले सप्ताह ही उसने पश्चिम बंगाल में चार चुनाव अधिकारियों को मतों में गड़बड़ी के आरोपों के तहत निलम्बित किया था।

इसी प्रकार की ज़िम्मेदारी उसे राहुल गांधी के आरोपों के संदर्भ में भी दिखानी चाहिए। इस चुनौती का सामना करने के लिए चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324 के पीछे छुपने या यह उम्मीद रखना कि सरकार उसका बचाव करने की बजाय अपनी संस्थागत आवाज़ को वापस लाना चाहिए। उसकी प्रतिक्रिया सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता जैसी प्रतीत नहीं होनी चाहिए।
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