दुश्मन पड़ोसी या प्रगतिशील साझेदार ?
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते आज जिस मुकाम पर हैं, उसे केवल डिप्लोमेसी कहना शायद काफी न हो। यह एक गहरा रणनीतिक और भावनात्मक इम्तिहान है। ख़ासकर पिछले कुछ हफ़्तों की घटनाएँ दिल्ली और ढाका के बीच आपसी भरोसे की पुरानी दीवार में नई दरारों का पता देने वाली कही जा सकती हैं। सयाने हाल ही में आई उस खबर को विशेष चिंताजनक बता रहे हैं, जिसने आर्थिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का चटगाँव के मीरसाराई में इंडियन इकोनॉमिक जोन प्रोजेक्ट को रद्द करने का फैसला! बेशक यह कोई सामान्य प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक कड़ा कूटनीतिक संकेत है। याद रहे कि इस प्रोजेक्ट को दोनों देशों के बीच भविष्य की आर्थिक साझेदारी का फ्लैगशिप माना जाता था। इसे रद्द करना यह दर्शाता है कि ढाका अब पुरानी सरकार (शेख हसीना शासन) के समय हुए समझौतों को संदेह की दृष्टि से देख रहा है।
यही नहीं, बांग्लादेश से पलायन करके दिल्ली आई हुई शेख हसीना के बयानों को लेकर ढाका का तीखा विरोध और जवाब में भारत द्वारा बांग्लादेश में तैनात अपने अधिकारियों के परिवारों को सुरक्षा कारणों से वापस बुलाना – जैसी तमाम घटनाएँ इस बात की तस्दीक करती हैं कि दोनों देशों के बीच सॉफ्ट पावर का ढाँचा फिलहाल चरमरा गया है। वर्तमान स्थिति को समझने के लिए हमें 12 फरवरी, 2026 की तारीख को केंद्र में रखना होगा।
बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव की तारीख! ये चुनाव न केवल वहाँ के लोकतंत्र (?) की दिशा तय करेंगे, बल्कि भारत के साथ उसके भविष्य के रिश्तों का खाका भी खींचेंगे। इसमें जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथ की बड़ी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। चुनावों से ठीक पहले जिस तरह से कट्टरपंथी ताकतों का उभार हुआ है, वह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक रेड सिग्नल है!
चुनावी हथियार बनती गंगा संधि, भारत-विरोध को हवा
सुरक्षा और लोकतंत्र को लेकर भारत का रुख स्पष्ट रहा है। हमें एक स्थिर और समावेशी बांग्लादेश चाहिए। लेकिन अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होते हमले और भारतीय संपत्तियों के खिलाफ हिंसा ने दिल्ली को वेट एंड वॉच की मुद्रा से बाहर आकर कड़े सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया है। स्वाभाविक है कि वहाँ की कट्टरपंथी त़ाकतें इसे पसंद नहीं करतीं। बड़ी बात यह कि सिर्फ राजनीति ही नहीं, भूगोल भी इस समय इम्तिहान ले रहा है।
दिसंबर 2026 में 1996 की गंगा जल संधि समाप्त हो रही है। ऐसे समय में जब आपसी भरोसा न्यूनतम स्तर पर है, इस संधि का नवीनीकरण एक टिकलिंग टाइम बम जैसा है। वर्तमान हालात में तय मानिए कि यह मुद्दा बांग्लादेश के चुनाव में भारत-विरोधी भावनाओं को भड़काने का सबसे बड़ा औजार बन सकता है। काश, बांग्लादेश के वर्तमान नेतृत्व ने चीनपरस्ती का रास्ता चुनने के बजाय तनिक वयस्कता दर्शाई होती!
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अंतत, भले ही मौसम खराब है, लेकिन कनेक्टिविटी और कॉमन इकोनॉमी के जहाजों को डूबने नहीं दिया जा सकता। हाल ही में समुद्री सीमा पर 151 मछुआरों की रिहाई और समुद्री गार्डों के बीच सहयोग यह उम्मीद जगाता है कि ज़मीनी स्तर पर मानवीय और व्यावहारिक कूटनीति अभी भी जीवित है। शायद समय आ गया है, जब भारत को हसीना-केंद्रित नीति से आगे बढ़कर बांग्लादेश के नए राजनीतिक यथार्थ और वहाँ की युवा पीढ़ी के साथ संवाद साधना चाहिए! वहीं, ढाका को यह समझना होगा कि भारत से दूरी उसके आर्थिक हितों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महँगी ही नहीं, जानलेवा साबित हो सकती है। 2026 के ये चुनाव और उसके बाद की कूटनीति यह तय करेगी कि हम दुश्मन पड़ोसी बनेंगे या प्रगतिशील साझेदार।
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