पर्यावरणविद एवं वैज्ञानिक सलाहकार – माधव गाडगिल
भारत के अग्रणी पर्यावरणविद डॉ.माधव गाडगिल का हाल ही में 7 जनवरी 2026 को निधन हो गया। माधव गाडगिल के जाने से हमने एक ऐसा विचारक, लेखक और योद्धा खो दिया जो पर्यावरण संरक्षण और उस पर निर्भर जन-जीवन, दोनों के बीच संतुलित समन्वय का पक्षधर था। वे उन दुर्लभ पर्यावरणविदों में से थे, जो प्रकृति के साथ-साथ आम इंसान से भी उतना ही प्रेम करते थे। आज जब पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, माधव गाडगिल को खोना एक बहुत बड़ी क्षति है।
प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के सरल और व्यवहारिक उपाय सुझाकर लोगों का जीवन स्तर कैसे सुधारा जा सकता है, इस दिशा में माधव राव गाडगिल की जागरूकता और प्रयास उल्लेखनीय रहे हैं। माधव राव प्रख्यात नियोजन विशेषज्ञ धनंजय राव गाडगिल के पुत्र थे। उन्हें प्रकृति प्रेम के शुरुआती पाठ अपने पिता से ही मिले। धनंजय राव को पक्षी निरीक्षण का शौक था और वे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली के मित्र थे।
बर्ड वॉचिंग के दौरान माधव गाडगिल अपने पिता के साथ जंगलों और घाटियों की सैर किया करते थे। इसी घुमक्कड़ प्रवृत्ति ने उनके मन में प्रकृति प्रेम के बीज बोए और उन्होंने जंगलों में घूमकर अध्ययन करने वाला जीव-विज्ञानी बनने का निर्णय लिया। माधव गाडगिल की उच्च शिक्षा हारवर्ड विश्वविद्यालय में हुई। भारत लौटने के बाद, दिसंबर 1971 में उन्होंने देवराइयों का अध्ययन करना शुरू किया।
माधव गाडगिल का प्रत्यक्ष अनुभव और वैज्ञानिक अध्ययन
देवराई वन के वे हिस्से या प्राकृतिक वनस्पतियों के वे क्षेत्र होते हैं, जिन्हें स्थानीय या अन्य समुदायों द्वारा किसी देवी-देवता या आध्यात्मिक शक्ति को समर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के कारण इन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप (जैसे पेड़ काटना, शिकार करना या खेती करना) पूरी तरह वर्जित होता है। इस तरह देवराई में प्रकृति को पनपने का मौका मिलता है। चूंकि माधव गाडगिल को जंगलों में भटकने का शौक था, इसलिए उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देवराइयों में जाकर उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया।
एक वैज्ञानिक के रूप में वे कभी भी केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने प्रकृति की खुली प्रयोगशाला में दुनिया भर की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर किसी से खुलकर संवाद किया और उनकी परंपराओं व पर्यावरण के प्रति उनके ज्ञान को समझा। यही कारण है कि समाज और गाडगिल को अलग करना असंभव है। देवराइयों के अध्ययन पर आधारित माधव गाडगिल का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जो आम जनता के लिए उनका पहला लेख था।
लेखनी से वैज्ञानिक और सामाजिक चेतना जगाने वाले
यहीं से उनकी निरंतर लेखन यात्रा शुरू हुई। विभिन्न समाचार पत्रों, साप्ताहिकों और पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए। कठिन वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने वाले माधव गाडगिल ने अपनी लेखनी से सामाजिक चेतना भी जाग्रत की। माधव गाडगिल ने कई सरकारी समितियों में काम किया। 1975 से 1980 के बीच वे कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य थे। उन्होंने प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।
पश्चिमी घाट, जहां उनका बचपन गुज़रा था, उसके सतत विकास कार्पाम में गाडगिल जी का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने स्थानीय लोगों और शासकों का ध्यान वहां के महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर आकर्षित किया। आगे चलकर उनकी वेस्टर्न घाट इकॉलॉजिकल एक्सपर्ट पैनल की रिपोर्ट बहुत चर्चित रही। जैव विविधता अधिनियम का मसौदा तैयार करने वाली समिति में रहते हुए, माधव गाडगिल ने पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर बनाने का विचार रखा, जिसे बाद में कानून में शामिल किया गया।
विज्ञान और समाज के सहयोग से सतत विकास के प्रबल समर्थक
यह रजिस्टर स्थानीय लोगों के लिए अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण का एक महत्वपूर्ण कानूनी साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य था कि यह ज्ञान या इन संसाधनों के आर्थिक लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचें और साथ ही वे संसाधन अक्षुण्ण भी बने रहें। माधव जी ने पर्यावरण के मुद्दे पर लोगों के साथ खड़ा रहना पसंद किया। उनका यह विश्वास था कि लोग अक्सर प्रकृति बचाने के पक्ष मे होते हैं। वे पर्यावरण बनाम विकास के विरोधाभास को भी भ्रामक मानते थे।
उनका विश्वास था कि विज्ञान का सहारा लेकर, प्रकृति के अनुरूप और लोगों के सहयोग से ही वास्तविक विकास संभव है। वर्ष 2015 में उन्हें प्रकृति संरक्षण और मानवीय विकास के समन्वय के लिए टायलर पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें पर्यावरण क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान चैंपियंस ऑफ दी अर्थ से नवाज़ा। वे सच में पर्यावरण क्षेत्र के चैंपियन थे। माधव गाडगिल का कार्य पर्यावरण शोधकर्ताओं, कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए हमेशा प्रेरणादायी रहेगा।
-संकेत राउत
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