देश की चुनावी राजनीति में निर्णायक होती महिलाएँ!

पिछले कुछ सालों में महिलाओं को विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक में जिस तरह से साधा गया है, उस कारण सभी राजनीतिक पार्टियां आज महिलाओं को साधने की होड़ में लगी हैं और संसद में जब भी महिलाओं से संबंधित कोई मुद्दा आता है, हर राजनीतिक दल यह दिखाने या साबित करने की कोशिश में रहता है कि वह महिलाओं का असली शुभचिंतक है।
भारत की चुनावी राजनीति में चाहे वो लोकसभा के चुनाव हों या विधानसभाओं के, महिलाएं एक खामोश क्रांति बनकर उभरी हैं। यह क्रांति नारों या भाषणों में ही नहीं बल्कि मतदान केंद्रों पर कतार में खड़ी उन महिलाओं के द्वारा हुई है या हुई मानी जा रही है, जो अब केवल परिवार के साथ वोट देनेवाली भर नहीं है बल्कि चुनाव का परिणाम तय करने वाली निर्णायक ताकत बन चुकी हैं। कभी हाशिये पर रहीं महिलाएं आज हर राजनीतिक दल की रणनीति के केंद्र में हैं।
चाहे मुफ्त योजनाओं का वायदा हो, चाहे सम्मान की राजनीति हो, चाहे सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल हो। हर जगह महिलाओं को हालिया कुछ सालों में सर्वाधिक तरजीह दी गई है, जिससे साफ पता चलता है कि आज जाति, धर्म से आगे जाकर महिलाएं अपने आपमें एक ताकतवर राजनीतिक वर्ग बनकर उभरी हैं।
हाल में जिस तरह से यह पता होने के बावजूद कि संशोधित महिला आरक्षण विधेयक गिर जायेगा, इसके बाद भी सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा पूरी गर्मजोशी से न केवल संसद में संशोधित महिला आरक्षण विधेयक फिर से पेश किया गया ताकि 2034 की बजाय 2029 से ही उन्हें विधानसभा और लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाए, जबकि इसके पहले 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक जो कि संसद में कानून बन चुका था, उसके मुताबिक महिलाओं को विधानसभाओं और लोकसभा में आरक्षण 2025 में होने वाली जनगणना के बाद दिया जायेगा, लेकिन जो जनगणना 2025 में शुरु होनी थी, वह अब जाकर शुरु हुई है और इस जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया के बाद बढ़ी हुई लोकसभा सीटों के तहत महिलाओं को जो आरक्षण दिया जाना है, वह 2029 के लोकसभा चुनाव के समय तक संभव नहीं है।
योजनाओं के जरिए महिला वोट बैंक साधने की होड़
इसलिए यह माना जा रहा था कि 2034 के लोकसभा चुनाव में ही 33 फीसदी महिला आरक्षण व्यवहारिक रूप से लागू होगा। साल 1950 से 60 के दशक में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी सीमित थी। जबकि आज कई राज्यों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहता है। साल 2024 तक महिलाएं वोटर बेस के रूप में 50 फीसदी के करीब पहुंच चुकी हैं। शायद यही कारण है कि महिलाओं की मजबूत होती राजनीतिक चेतना को देखते हुए आज कोई भी राजनीतिक दल उनकी अनदेखी करने की सोच नहीं सकता।
इसका सबूत है कि पिछले 10-12 सालों में रेवड़ी राजनीति के केंद्र में ज्यादातर महिलाएं ही रही हैं। चाहे मुफ्त गैस की उज्जवला जैसी योजना रही हो, चाहे राज्यों द्वारा अपने-अपने ढंग से महिलाओं को दी गई सम्मान निधि की योजनाएं रही हों, चाहे दिल्ली, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में महिलाओं को प्रदान की गई मुफ्त बस यात्रा योजना हो या फिर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की लाडली बहना और लाड़की तथा लक्ष्मीबाई जैसी योजनाओं को महिलाओं के कल्याण वाली योजनाएं रही हों, इन सभी योजनाओं का लक्ष्य एक ही रहा महिला वोटरों को लुभाना और उन्हें अपना निष्ठावान वोट बैंक बनाना।
50% सीटें नहीं, फिर भी महिला राजनीति पर जोर
आज महिलाओं को लेकर उन्हें लुभाने की राजनीति एक अकेली भाजपा ही नहीं कर रही बल्कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं। चाहे वह दिल्ली में लंबे समय तक सत्ता में रही आम आदमी पार्टी रही हो, चाहे पश्चिम बंगाल में काबिज तृणमूल कांग्रेस हो, सभी की रणनीति, महिला उम्मीदवारों को लुभाना और अपना वोट बैंक बढ़ाना रही है। इसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने महिलाओं पर फोकस अलग-अलग तरह की योजनाओं के जरिये किया है और सभी ने हर सार्वजनिक मंच पर महिला मुद्दों पर आक्रामक राजनीति भी की है।
यह अलग बात है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अभी तक चुनावों में महिलाओं को 50 फीसदी सीटें चुनाव लड़ने के लिए नहीं दी, लेकिन महिलाओं के वोटर बेस के 50 फीसदी होने के कारण हर राजनीतिक पार्टी प्रतिस्पर्धी महिला राजनीति कर रही है। सवाल है क्या महिलाएं वास्तव में देश की राजनीतिक धूरी बनकर उभरी हैं या फिर उनका वोट हासिल करने के लिए ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियां ऐसा माहौल बना रही हैं? इसमें कोई दो राय नहीं है कि पंचायतों में आरक्षण के बाद लाखों महिला नेता पैदा हुई हैं।
लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी 14% के आसपास ही सीमित
यह महिला राजनीतिक शक्ति का उदय ही है कि आज राजनीति में 14.5 लाख से ज्यादा निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, लेकिन इस दिखने वाली ताकत की एक सीमा भी है, क्योंकि आज भी लोकसभा में सिर्फ 14 फीसदी महिलाएं ही हैं। जबकि हम जानते हैं कि देश की राजनीति को निर्णायक ताकत और दिशा संसद से ही मिलती है और भारत की संसद में महिलाओं की मौजूदगी दुनिया के कई देशों के मुकाबले बहुत कम है। भारत वैश्विक रैंकिंग में (महिला राजनीति) काफी पीछे है।
इसका मतलब ये है कि महिलाएं वोटर के रूप में तो सर्वाधिक ताकतवर वर्ग के रूप में उभरी हैं, लेकिन उनका लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व अभी भी कमजोर है। विशेषकर लोकसभा के चुनाव में जिस तरह महिलाओं की संख्या 13-14 फीसदी के आसपास ही पिछले 75-76 सालों में बनी हुई है, उसे देखकर साफ लगता है कि हकीकत कुछ और है और बताने की कुछ और कोशिश हो रही है। बहरहाल अब जबकि महिला वोट बैंक में निर्णायक बढ़ोत्तरी हुई है, तो देर-सवेर महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है और इसी प्रतिनिधित्व का श्रेय लेने के लिए आज हर राजनीतिक पार्टी सबसे आगे खड़ी नजर आना चाहती है।
-लोकमित्र गौतम
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