जॉर्ज सोरोस बनाम एलन मस्क

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के अरबपति परोपकारी जॉर्ज सोरोस को राष्ट्रपति पदक से सम्मानित करने के हालिया निर्णय ने टेस्ला के सीईओ एलन मस्क और विभिन्न रिपब्लिकन हस्तियों को बुरी तरह भड़का दिया है। मस्क ने इस फैसले को अन्याय करार देते हुए सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की है।

सयाने याद दिला रहे हैं कि सोरोस ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के माध्यम से कथित व्यापक परोपकारी प्रयासों के लिए जाने जाते हैं। दुनिया भर में लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए उनके रहस्यपूर्ण समर्थन ने उन्हें प्रशंसा और आलोचना, दोनों का पात्र बनाया है। माना जाता है कि उन्होंने अकूत पैसे के ज़ोर से राजनीतिक नतीजों और नीतियों को प्रभावित किया है।

एलन मस्क की आवाज़ इस चर्चा को एक उल्लेखनीय आयाम देती दिखाई पड़ रही है। मस्क एक उच्च-प्ऱोफाइल उद्यमी हैं। दुनिया भर में बड़ी संख्या में उनके फॉलोवर हैं। यानी, उनकी राय की गूँज देर तक और दूर तक जाएगी ही। उनका सोरोस की तुलना स्टार वार्स के खल चरित्र डार्थ सिडियस से करना, बाइडेन के फैसले से उनके गहरे असंतोष का प्रतीक है। व्यापक षड्यंत्रकारी यह चरित्र शायद सोरोस के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हो; और वैश्विक राजनीति में एक चालाक व्यक्ति की भूमिका के सर्वथा उपयुक्त भी!

रिपब्लिकन हलके की प्रतिक्रिया भी समान रूप से तीव्र रही है। संयुक्त राष्ट्र में पूर्व राजदूत निक्की हेली ने तो इस पुरस्कार को राष्ट्रीय अपमान तक कह डाला है। उनका मानना है कि इससे यह संदेश जाता है कि राष्ट्रपति उन लोगों को पुरस्कृत कर रहे हैं, जिनके कार्यों ने अमेरिकी मूल्यों और सुरक्षा को कमजोर किया है। यह नज़रिया उन लोगों की व्यापक प्रतिािढया को जताता है जो सोरोस के बढ़ते असर को पारंपरिक सामाजिक ढाँचे के लिए खतरनाक मानते हैं।

अमेरिकी राजनीति की बात करें तो यह विवाद उसमें गहराते ध्रुवीकरण और राष्ट्रीय सम्मान जैसे इशारों की विवादास्पद प्रकृति का आईना है। सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर अमेरिका के इस सर्वोच्च सम्मान के लिए कुछ स्थायी मानदंड है या नहीं; या कि राष्ट्रपति की सनक और हनक ही किसी को भी इसका पात्र मानने के लिए पर्याप्त है! कहीं इससे खुद सम्मान का सम्मान खतरे में न पड़ जाए!

अब तनिक भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी विचार कर लिया जाए। सर्वविदित है कि सोरोस की ख्याति हमारे यहाँ एक अवांछित पात्र जैसी है। उन्हें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की अनावश्यक आलोचना करने और भारतीय लोकतंत्र के बारे में द्वेषपूर्ण टिप्पणियों के लिए जाना जाता है। वे गाहे-बगाहे देश के संप्रभु मामलों में अनुचित और अनाधिकार दखलंदाजी के आदी हैं। इसलिए अगर अमेरिकी प्रशासन द्वारा उनके सम्मान को कुछ लोग उनकी भारत-निंदा पर अमेरिका की मुहर के रूप में प्रचारित करें तो अचरज नहीं होना चाहिए। देखना होगा कि इससे दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों पर विपरीत असर न पड़े।

सोरोस के कृपापात्रों और अनुयायियों को भी हल्की राजनीति के मोह में बहने से खुद को बचाना होगा।अंतत, यह प्रकरण वैश्विक परोपकार के छद्म और राष्ट्रीय राजनीति के बीच जटिल संबंधों को भी रेखांकित करता है। कहना गलत न होगा कि भारत सहित दुनिया भर में, कथित नागरिक समाज पहलों के लिए सोरोस के भारी वित्तीय समर्थन को ज़मीनी स्तर पर सरकार-विरोधी आंदोलनों को सशक्त बनाने और तख्ता पलटने का विदेशी एजेंडा लागू करने की गहरी साजिश के रूप में देखा गया है! अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा उन्हें सम्मानित करने से इस संदेह को बल मिलना स्वाभाविक है कि बाइडेन सरकार उनकी कुचालों की समर्थक रही है!

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