सूचनाएं छुपाने से कमज़ोर होता आरटीआई क़ानून
अदालत ने सीआईसी व राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पड़े स्थानों को तुरंत पारदर्शिता के साथ भरने पर बल दिया था, यह कहते हुए कि आरटीआई क़ानून स्वत: ही अपीलों व शिकायतों का तेज़ी से निस्तारण करने को कहता है। खंडपीठ ने कहा था कि मुख्य या पर्याप्त संख्या में आयुक्तों के न होने से आयोग का कामकाज बाधित होता है, जिससे इस क़ानून का उद्देश्य ही अर्थहीन हो सकता है। सीआईसी में संकट केवल प्रतीकात्मक नहीं है – वह केसों के निरंतर बढ़ते बैकलॉग में प्रतिबिम्बित होता है, 30,000 से भी अधिक केस लम्बित हैं और अब प्रार्थियों को सुनवायी के चरण तक आने में भी एक साल से ज़्यादा का समय लगता है। फिर अक्सर आदेश ऐसे सुनाये जाते हैं जिनका न सिर होता है न पैर, रेलवे किराया फार्मूला इसकी ताज़ा मिसाल है। इसके अतिरिक्त आरटीआई के दायरे से बाहर की जाने वाली संस्थाओं की संख्या में भी निरंतर इज़ाफा किया जा रहा है।
आप यह सवाल नहीं कर सकते कि भारतीय रेल आपसे जितना किराया लेती है, वह क्यों लेती है? केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के नवीनतम आदेश से जनता को यही संदेश मिलता है, जबकि इस संस्था का गठन ही यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आये और आवाम को अधिक से अधिक जानकारी आसानी से उपलब्ध हो जाये। इस संदर्भ में एक प्रार्थी ने 25 जनवरी 2024 को आरटीआई अर्ज़ी दाखिल की थी, यह जानने के लिए कि रेलवे विभिन्न श्रेणियों के लिए विभिन्न स्थितियों जैसे तत्काल के तहत यात्री किराया कैसे निर्धारित करती है?
अब दो वर्ष की प्रतीक्षा के बाद इस अर्ज़ी को इस आधार पर ख़ारिज कर दिया गया है कि रेल का किराया व्यापार गोपनीयता / बौद्धिक संपत्ति अधिकारों के अंतर्गत आता है, इसलिए सूचना अधिकार क़ानून (आरटीआई) के तहत उसे उजागर नहीं किया जा सकता। बात समझ में आ गई। व्यापार राज़ों को राज़ ही रखा जाये, जैसे कोकाकोला का फार्मूला जिसे एक काग़ज़ पर लिखकर बैंक के लॉकर में छुपा कर रख दिया गया है ताकि कोई प्रतिद्वंदी उसकी नकल करके उस जैसा शीतल पेय तैयार न करने लगे।
एकदम सही बात। लेकिन रेलवे का प्रतिद्वंदी कौन है? आप चाहे रेल में जम्मू-कश्मीर में सवार हों या तमिलनाडु में, असम में या गुजरात में, आप भारतीय रेल में ही सवार हो रहे हैं, जोकि भारत सरकार की मोनोपोली है और जिसका बजट संसद में पारित किया जाता है।
रेलवे की गोपनीयता दलील और सीआईसी की चुप्पी पर सवाल
हां, अगर आप तेजस एक्सप्रेस की बात कर रहे हैं जिसे आईआरसीटीसी चलाती है, तो भी जान लें कि वह भी रेल मंत्रालय के तहत आती है और फलस्वरूप भारत की जनता उसकी मालिक है। अत: यह प्रश्न तो बनता है कि रेलवे को यह बताने में क्या व्यापार खतरा है कि वह किराया राशि का हिसाब कैसे लगाती है, मसलन पश्चिम सुपऱफास्ट एक्सप्रेस के 2 एसी कोच में निचली बर्थ का, जिसके बारे में प्रार्थी ने जानना चाहा था?
दरअसल, इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि रेलवे ने जानकारी देने से इंकार कर दिया क्योंकि वह तो ऑफिशियल पोट्स एक्ट पर पनपी सरकारी संस्था है और सरकार न सवाल सुनना चाहती है और न पारदर्शिता के पक्ष में है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में करोड़ों रूपये वेतन पाने वाले एंकर भी सरकार से नहीं, विपक्ष से प्रश्न करते हैं। लेकिन हैरत तो इस बात पर है कि सीआईसी ने रेलवे के (कु)तर्क को स्वीकार कर लिया। हाल के एक अन्य मामले में सीआईसी कस्टम्स विभाग की इस बात से सहमत हुई कि मेघालय से बांग्लादेश को जो चूना-पत्थर निर्यात किया जा रहा है उसकी जानकारी साझा करने से किसी प्रकार का जनहित नहीं होने जा रहा है।
यह जानकारी तो स्वत: ही पब्लिक डोमेन में होनी चाहिए। शोधकर्ताओं, पर्यावरणविदों या किसी अन्य को उसकी ज़रूरत हो सकती है। बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, जिसके विरोध में आप नहीं चाहते कि वहां का कोई क्रिकेटर आईपीएल में खेले, लेकिन आप उससे व्यापार संबंध बनाये रखेंगे और यह भी नहीं बतायेंगे कि खनन (वैध या अवैध) करके कितना चूना-पत्थर ढाका को भेजा जा रहा है। अजीब विरोधाभास है?
मुख्य सूचना आयुक्त की रिक्ति से बढ़ता पारदर्शिता संकट
हालांकि इस समय सीआईसी के सभी पद भरे हुए हैं कि मुख्य सूचना आयुक्त राजकुमार गोयल व 10 अन्य सूचना आयुक्त मौजूद हैं, लेकिन इनमें से 9 नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट के सख्त होने पर 15 दिसंबर 2025 व उसके बाद हुई हैं यानी उससे पहले लम्बे समय तक सीआईसी में सिर्फ दो आयुक्त थे व मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी खाली था, जिससे लम्बित अर्ज़ियों की संख्या 32,000 से भी अधिक हो गई, जिनमें से कुछ तो वर्षों पुरानी हैं।
रिक्त स्थानों व लम्बित अर्ज़ियों की स्थिति राज्यों में तो इससे भी अधिक बदतर है। कर्नाटक में अब जाकर राज्य सूचना आयोग में आयुक्तों के सभी रिक्त स्थान भरे गये हैं और ऐसा सिर्फ कर्नाटक में हुआ है, शेष राज्यों की स्थिति का अंदाज़ा स्वत: ही लगाया जा सकता है। झारखंड में पिछले पांच साल से सूचना आयोग ठप्प पड़ा है, नये केस पंजीकृत नहीं किये जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में केवल एक आयुक्त है और लगभग 35,000 केस लम्बित हैं। महाराष्ट्र में 2025 के अंत तक आयुक्तों के तीन पद रिक्त थे और एक लाख से अधिक मामले लम्बित थे।
सीआईसी में विवादों की कहानी पुरानी है। नियुक्तियां देर से होती हैं और केसों का ढेर लगता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्थिति निरंतर बद से बदतर होती जा रही है। पिछले 11 वर्षों में 7 बार ऐसा हुआ कि सीआईसी में कोई मुख्य सूचना आयुक्त महीनों तक नियुक्त नहीं किया गया, जिससे पारदर्शिता व जवाबदेही की गंभीर चिंताएं उत्पन्न हुईं। हीरालाल सामरिया ने यह पद 13 सितंबर 2025 में छोड़ा था और उनके स्थान पर राजकुमार गोयल की नियुक्ति 15 दिसंबर 2025 को हुई।
मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली रहने से प्रशासन ठप
गौरतलब है कि क़ानूनन प्रशासनिक शक्तियां केवल मुख्य सूचना आयुक्त के पास होती है, शेष आयुक्तों के पास नहीं, इसलिए मुख्य सूचना आयुक्त के पद को खाली नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को आयुक्तों के अवकाश ग्रहण करने की तिथि पहले से ही मालूम होती है, लेकिन फिर भी अगली नियुक्ति देरी से की जाती है और वह भी अक्सर एक्टिविस्टों के दबाव व सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, जैसा कि हाल ही में सीआईसी में हुआ और तब जाकर 11 में से खाली पड़े 9 पद भरे गये। यहां अंजली भारद्वाज व अन्य बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के ऐतिहासिक फैसले को याद करना आवश्यक प्रतीत होता है।
अदालत ने सीआईसी व राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पड़े स्थानों को तुरंत पारदर्शिता के साथ भरने पर बल दिया था, यह कहते हुए कि आरटीआई क़ानून स्वत: ही अपीलों व शिकायतों का तेज़ी से निस्तारण करने को कहता है। खंडपीठ ने कहा था कि मुख्य या पर्याप्त संख्या में आयुक्तों के न होने से आयोग का कामकाज बाधित होता है, जिससे इस क़ानून का उद्देश्य ही अर्थहीन हो सकता है।
सीआईसी में संकट केवल प्रतीकात्मक नहीं है – वह केसों के निरंतर बढ़ते बैकलॉग में प्रतिबिम्बित होता है, 30,000 से भी अधिक केस लम्बित हैं और अब प्रार्थियों को सुनवायी के चरण तक आने में भी एक साल से ज़्यादा का समय लगता है। फिर अक्सर आदेश ऐसे सुनाये जाते हैं जिनका न सिर होता है न पैर, रेलवे किराया फार्मूला इसकी ताज़ा मिसाल है। इसके अतिरिक्त आरटीआई के दायरे से बाहर की जाने वाली संस्थाओं की संख्या में भी निरंतर इज़ाफा किया जा रहा है।
सीआईसी के पुराने फैसले बनाम आज की बदलती भूमिका
राजनीतिक दलों, बीसीसीआई आदि को आरटीआई एक्ट से बाहर रखने का औचित्य किसी की समझ में आता है?आरटीआई एक्ट को कमज़ोर कर दिया गया है या किया जा रहा है। हमेशा से स्थिति ऐसी नहीं थी। दो दशक पहले इस क़ानून को शासन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लाया गया था और सीआईसी को इसका संरक्षक बनना था। एक प्रार्थी ने जब 2017 में यह जानना चाहा कि सरकार ने एयराफ्ट कैरियर आईएनएस पामादित्य (गोर्शकोव) पर रूस के बढ़े हुए बिल को क्यों स्वीकार किया तो सीआईसी ने प्रार्थी का साथ दिया था।
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उसने 2011 में आरबीआई की आपत्ति को अस्वीकार करते हुए पीएसयू बैंकों के 100 टॉप डिफाल्टर्स की सूची जारी करने को कहा था। लेकिन अब डिफाल्टर्स की समान सूची के आग्रह को बड़ी बेंच को सौंप दिया गया है, जबकि आरबीआई कह रही है कि यह सूचना सार्वजनिक होनी चाहिए। भारत को 2026 में 2016 की तुलना में अधिक पारदर्शी होना चाहिए लेकिन अगर सीआईसी वैध आग्रहों को भी ब्लॉक करती रहेगी तो ऐसा कैसे होगा, जबकि 9 साल बाद वह पूरी स्ट्रेंथ में है। अगर नये केस न भी लिए जाये तो भी 32,000 केसों को निपटाने में तीन साल लगेंगे। इससे आरटीआई का पूरा उद्देश्य ही पराजित हो जाता है।
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