उच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत आलोचना पर चिंता जताई

हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने कहा कि फैसलों को लेकर असंतुष्ट अधिवक्ताओं और वादियों द्वारा न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से आलोचना करने और दुर्व्यवहार करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस प्रकार न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से आलोचना कर उन्हें स्थानांतरित करने की माँग की जा रही है। इतना ही नहीं, न्यायाधीशों पर एकतरफा फैसला करने का आरोप लगाते हुए भी आलोचना की जा रही है, जिसका न्याय व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

गौरतलब है कि रंगारेड्डी ज़िले के शेरीलिंगमपल्ली मंडल के गोपन्नापल्ली निवासी पेद्दीराजू की शिकायत के आधार पर दर्ज एक भू-विवाद मामले में मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी (तत्कालीन सांसद) को आरोपी बनाया गया था। इस मामले को खारिज करने के आग्रह के साथ रेवंत रेड्डी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य ने मामले को खारिज करने के आदेश जारी किए।

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कोर्ट ने न्यायाधीशों पर आरोप को खारिज किया

न्यायाधीश ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का मामला बिना किसी आधार के दर्ज किया गया था। न्यायाधीश ने शिकायतकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि उन्होंने आदेश जारी करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस कारण फैसला नहीं सुनाया जाना चाहिए। इस पर शिकायतकर्ता पेद्दीराजू ने उनकी याचिका को स्थानांतरित करने की माँग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखाया और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने और बहस के लिए पर्याप्त अवसर न देने का आरोप लगाया।

सर्वोच्च न्यायालय ने लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए दायर याचिका न केवल खारिज कर दी, बल्कि न्यायाधीश के खिलाफ किए गए इस हमले को गंभीरता से लेते हुए शिकायतकर्ता पेद्दीराजू समेत अधिवक्ता रितेश पाटिल और नितिन महेश के खिलाफ स्वयं संज्ञान के तहत अदालत की अवमानना का मामला दर्ज करते हुए इस मामले को पुन प्रारंभ करने के आदेश दिए। इसके साथ ही तीनों को न्यायाधीश के समक्ष बेशर्त माफी माँगते हुए हलफनामा दायर करने के भी आदेश दिए।

इस आदेश के चलते तीनों आज सुनवाई के दौरान अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर बेशर्त माफी माँगते हुए हलफनामा दायर किया। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य ने कहा कि वर्तमान समय में न्यायाधीशों के खिलाफ फैसलों को लेकर व्यक्तिगत रूप से की जा रही आलोचना और टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

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