यू ट्यूबर के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की उच्च न्यायालय ने
हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले यू ट्यूबर दुर्गम शशिधर गौड़ उर्फ नल्ला बालू के खिलाफ तीन मामले दर्ज करने को लेकर पुलिस की कड़ी आलोचना की और इस मामले के संबंध में अहम आदेश जारी किए। तेलंगाना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस तुकारामजी ने एक सनसनीखेज फैसला सुनाते हुए नल्ला बालू के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर रद्द कर दिए। उन्होंने कहा कि मामला तभी दर्ज किया जाना चाहिए, जब प्रथम दृश्या सबूत हो न कि तीखी राजनीतिक आलोचना और कठोर टीका-टिप्पणियों को लेकर आपराधिक मामले दर्ज करना अनुचित है।
सोशल मीडिया पर पोस्ट को लेकर मामला दर्ज करने से पहले पुलिस और मेजिस्ट्रेट कोर्ट के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। यह तय किया गया है कि ट्वीट वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में आते हैं, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ मामले दर्ज करना, जाँच को यंत्रवत और एकतरफा तरीके से किए जाने से रोकने के लिए ही दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं।
उच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी एफआईआर को अवैध ठहराया
उच्च न्यायालय के इस फैसले से राज्य सरकार को गहरा झटका लगा है, क्योंकि अदालत ने सोशल मीडिया पोस्ट पर गैर-कानूनी मुकदमे दर्ज करने के राज्य सरकार के तरीके को अनुचित बताया और कहा कि गैर-कानूनी तरीके से मुकदमे दर्ज करना पूरी तरह से अवैध है। संविधान से प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले कदम उठाना भी जायज नहीं है। अदालत ने कहा कि पुलिस को कानून के अनुसार काम करना चाहिए और बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा ट्विटर पर सरकार के खिलाफ किए गए ट्वीट के आधार पर मुकदमा दर्ज करना अवैध है।
पुलिस से शिकायत करने वाले व्यक्ति या मुकदमा दर्ज करने वाली पुलिस द्वारा कानून के प्रावधानों का विश्लेषण किए बिना एकतरफा एफआईआर दर्ज करना अवैध है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उस पोस्ट के कारण किसे नुकसान हुआ है। व्यक्तिगत रूप से नुकसान का आकलन करना पुलिस की जिम्मेदारी है। न्यायाधीश ने याद दिलाया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी पुलिस को इस आकलन के बाद ही एफआईआर दर्ज करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे।
अदालत ने पुलिस पर इन दिशा-निर्देशों को लागू किए बिना कार्रवाई करने का आरोप लगाया। यह कहकर कि मुख्यमंत्री के खिलाफ पोस्ट करने से भावनाएँ आहत हुई हैं और सामाजिक संतुलन बिगड़ेगा, इस प्रकार के झूठे आधार पर मामले जारी नहीं रखे जा सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर मानहानि हुई है, तो पीड़ित को सीधे शिकायत दर्ज करनी चाहिए न कि किसी तीसरे पक्ष के जरिए शिकायत की जानी चाहिए। इस आधार पर पुलिस को मामला दर्ज करने का हक नहीं है।
नल्ला बालू की सोशल मीडिया टिप्पणी पर एफआईआर विवाद
इस मामले पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता नल्ला बालू की ओर से अधिवक्ता टी.वी. रमणा राव ने दलील देते हुए बताया कि पुलिस ने सोशल मीडिया (ट्विटर) पर कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी पर अनुचित टिप्पणी करने के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज किए हैं। याचिकाकर्ता ने ट्विटर पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का शासन 20 प्रतिशत कमिशन का शासन है, इस सरकार का कोई विजन और मिशन नहीं है और कांग्रेस राज्य के लिए अभिशाप है।
इस टिप्पणी को लेकर मामले दर्ज कर याचिकाकर्ता को 20 दिन के लिए जेल भेज दिया गया। नल्ला बालू ने इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। दलील जारी रखते हुए रमणा राव ने कहा कि यह टिप्पणियाँ आपराधिक कृत्य नहीं है। लेकिन राज्य सरकार ने इसे राजनीतिक आलोचना, हिंसा, द्वेष और दंगे पैदा करने वाली पोस्ट करार देते हुए तीन मामले दर्ज किए। पुलिस को बीएनएस की धारा 192, 352 और 353 के तहत मामले दर्ज करने का अधिकार नहीं है।
नल्ला बालू द्वारा सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट के कारण मुख्यमंत्री को ठेस पहुँचती है, तो उन्हें सीधे तौर पर शिकायत करनी चाहिए। पुलिस या अन्य को इस मामले पर शिकायत करने का अधिकार नहीं है। इस प्रकार इस आधार पर एफआईआर दर्ज करना कानून के खिलाफ है। प्रतिवाद करते हुए पुलिस की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए बताया कि याचिकाकर्ता नल्ला बालू ऐसे मामलों में आरोपी है और याचिकाकर्ता ने जान-बूझकर मुख्यमंत्री को बदनाम करने और उनके खिलाफ जनता का गुस्सा भड़काने के लिए ही यह पोस्ट किए हैं। उन्होंने मामले की जाँच जारी रखने का आग्रह किया।
राजनीतिक आलोचना पर एफआईआर रद्द, अधिकार सुरक्षित
दोनों पक्षों की दलील सुनने के पश्चात न्यायाधीश जस्टिस एन. तुकारामजी ने बताया कि राजनीतिक आलोचना चाहे वह कठोर हो या तल्ख हो सभी व्यक्तिगत भाव स्वेच्छा के अधिकार के अंतर्गत आते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद-19(1)(ए) के तहत भारत के नागरिकों को दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है। इस कारण ये राजनीतिक आलोचना है। ये ऐसी आलोचना नहीं है, जो हिंसा, दंगे, द्वेष, लोगों को भड़काने जैसे कार्यों को अंजाम देती हो।
इस कारण संबंधित धाराएँ इस पर लागू नहीं होती। यदि प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की बात आती है, तो जिस व्यक्ति के सम्मान और प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है, उसे शिकायत करनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसीलिए शिकायतों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती। यह स्पष्ट है कि एफआईआर पूरी तरह से बिना किसी जाँच के दर्ज की गई है और यह कानून के खिलाफ है।
इस संदर्भ में न्यायाधीश ने ललिता कुमारी मामले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मामला इन दिशा-निर्देशों के खिलाफ है। इसके साथ ही न्यायाधीश ने रामागुंडम, करीमनगर और जीडीके वन टाउन पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज किए गए मामलों को रद्द कर दिया। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि राजनीतिक आलोचना के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करना भी अमान्य है।
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