हैद्रा की कार्रवाइयों से हाईकोर्ट नाराज़
हैदराबाद, तेलंगाना हाईकोर्ट ने हैद्रा को कड़ी फटकार लगाते हुए कई तरह के सवाल किये। अदालत ने पूछा कि क्या हैद्रा सरकार और संवैधानिक संस्थाओं विशेषकर अदालतों से परे है? क्या हैद्रा सरकार के समानांतर शासन चला रही है? क्या हैद्रा खुद को अदालतों से ऊपर मान रही है?
अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हैद्रा पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा कि हैद्रा के तौर-तरीके किसी भी तरह कानून के अनुरूप नहीं हैं। अदालत के आदेशों की अवहेलना करते हुए रातों रात न्यायिक विवाद में चल रही जमीनों में जाकर बोर्ड लगाने की कार्रवाई से जवाब तलब किया गया। न्यायालय में विवादित जमीनों को सरकारी जमीन बताते हुए बाड़ और बोर्ड लगाने के तरीके पर भी आपत्ति जताई और 48 घंटे के भीतर बोर्ड हटाने का निर्देश दिया।
मेड़चल-मल्काजगिरी जिले के सूराराम गाँव में अपनी संपत्ति को हैद्रा द्वारा कब्जे में लेने को चुनौती देते हुए जितेंद्र नामक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर न्यायमूर्ति एन.वी. श्रवण कुमार ने आज सुनवाई की। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि बिना किसी नोटिस के हैद्रा अधिकारियों ने सर्वे नंबर 105 में स्थित दो प्लॉटों को कब्जे में लेकर बाड़ लगा दी। उन स्थानों पर सार्वजनिक बोर्ड भी लगा दिए गए, जबकि हाईकोर्ट पहले ही स्थायी निषेधाज्ञा जारी कर चुका था। इसके बावजूद अधिकारियों ने उसे नजरअंदाज किया। बताया गया कि गत 6 मार्च को बिना कोई पूर्व सूचना दिए अधिकारी वहाँ पहुँचे और फेंसिंग व बोर्ड लगा दिए।
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पार्क भूमि होने से नियमितीकरण आवेदन खारिज
इस पर हैद्रा के वकील ने कहा कि यह लेआउट 1978 में बना था और इसमें कुल 102 प्लॉट हैं। इनमें दो जगह पार्क और सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित हैं। याचिकाकर्ताओं ने नियमितीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन जमीन पार्क के लिए निर्धारित होने के कारण उसे विचार में नहीं लिया गया। सुरक्षा के तौर पर फेंसिंग की गई। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हाईकोर्ट ने अदालत के अंतरिम आदेशों की हैद्रा द्वारा अनदेखी पर नाराज़गी जतायी।
अदालत ने पूछा कि विवादित जमीनों को कब्जे में लेने का अधिकार हैद्रा को किसने दिया? क्या इसके लिए राजस्व और नगरपालिका विभागों से कोई अनुमति ली गई है, उसके रिकॉर्ड कहाँ हैं? अदालत ने यह भी पूछा कि न्यायिक विवादों में फँसी जमीनों की सुरक्षा पर, जो विशेष ध्यान दिखाया जा रहा है, वही जल संसाधनों और सड़कों की सुरक्षा के लिए क्यों नहीं दिखाया जाता? विवादित जमीनों की रक्षा के लिए अदालत की अनुमति लेना आवश्यक है। अदालत ने पूछा कि बिना अदालत की अनुमति के स्वामित्व अधिकार कैसे तय किए जा सकते हैं।
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि हैद्रा अदालत की अवमानना करता है, तो इसके परिणाम गंभीर होंगे। न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही स्पष्ट किया कि अदालत के आदेशों के बावजूद बाड़ लगाना और जमीन को अपनी बताते हुए बोर्ड लगाना आदेशों का उल्लंघन है। बोर्ड हटाने का निर्देश दिये जाने के बावजूद अदालत ने बाड़ को जारी रखने की अनुमति दी। हैद्रा को प्रति याचिका दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 10 जून तक स्थगित कर दी गयी।
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