आतंकवाद के ऐसे व्यापक तंत्र का उत्तर कैसे दें

देश हम सबका है और सभी को विचार करना पड़ेगा कि आखिर आतंकवाद से प्रत्यक्ष संघर्ष की बजाय ऐसी प्रतिक्रियाओं से उनके परोक्ष समर्थन के व्यापक व्यवहार से कैसे निपटा जाए। अभी एक मॉड्यूल हमारे सामने आया है। निश्चित मानिए ऐसे कई मॉड्यूल देश के अलग-अलग जगहों में सक्रिय होकर साजिशों को अंजाम देने में संलिप्त होंगे। किसी तरह वे कुछ करने में सफल हुए या साजिश अंजाम देने के पहले पकड़े गए तब भी सामूहिक प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी।

दिल्ली लाल किला आतंकवादी कार विस्फोट की छानबीन से आ रही जानकारियों ने पूरे देश में भय और सनसनाहट पैदा कर दी है। अभी तक की जानकारियां बता रही हैं कि अगर आतंकवाद का यह मॉड्यूल सफल हो गया होता तो देश में जगह-जगह अनगिनत विस्फोट होते और उसमें होने वाली मानवीय एवं संपत्तियों की क्षति का तो आकलन भी नहीं किया जा सकता। सच कहें तो आतंकवाद के दौर की शुरुआत से अब तक पूरे देश में विध्वंस पैदा करने का यह सबसे बड़ा तंत्र सामने आया है।

बताया गया है कि विस्फोट के लिए 32 कारों की व्यवस्था थी जिनमें से कई बरामद हो चुकी हैं। इन कारों के अलावा अलग-अलग तरीकों से भी विस्फोटों की तैयारी थी। उनकी तैयारियों का एक उदाहरण देखिए। कार विस्फोट में आत्मघाती बना उमर उन नबी के जम्मू-कश्मीर अनंतनाग के काजीगुंडा के गिरफ्तार साथी जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश से पता चला है कि हमास द्वारा 7 अक्तूबर, 2023 को इजराइल पर किए गए ड्रोन और रॉकेट से हमला की पुनरावृति करने की भी तैयारी थी। उसे छोटे ड्रोन हथियार बनाने और उन्हें मॉडिफाई करने का तकनीकी अनुभव है।

उसने डॉ. उमर को तकनीकी मदद दी और वह भीड़भाड़ वाले इलाके में ड्रोन से बम गिराने की योजना को साकार करने के लिए ड्रोन और रॉकेट बनाने की कोशिश कर रहा था। विस्फोट में इस्तेमाल कार खरीदने के लिए दिल्ली आया राशिद अली भी जम्मू-कश्मीर का रहने वाला है। वास्तव में अब तक की छानबीन हमें कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने को भी विवश करती है।

छह डॉक्टर गिरफ्तार, मजहब के नाम पर हिंसा की योजना में संलिप्त

अभी तक इस भयानक आतंकवादी मॉड्यूल में छह ऐसे सम्मिलित डॉक्टर गिरफ्तार किए गए हैं जिनका दिमाग चिकित्सा में अच्छा करने की जगह मजहब के नाम पर हमला हत्या और विध्वंस पैदा करने की दिशा में ही लगा था। श्रीनगर का रहने वाला एक अन्य संदिग्ध डॉ. निसार फरार है। वह डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ कश्मीर का अध्यक्ष भी है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने डॉ.निसार को बर्खास्त कर दिया है।

इन्होंने अचानक कार विस्फोट नहीं किया बल्कि पहले से कोशिश चल रही थी। 6 दिसंबर को अयोध्या से लेकर अनेक स्थलों पर विस्फोट करने और उसके बाद इसकी श्रृंखला कायम रखने की तैयारी थी। अलफलाह यूनिवर्सिटी से गिरफ्तार डॉ. मुजम्मिल गनई के मोबाइल फोन से प्राप्त डंप डेटा से पता चला है कि उसने और उमर ने इस वर्ष जनवरी में लाल किले क्षेत्र की भी कई बार रेकी की थी।

ये रेकी गणतंत्र दिवस पर इसको निशाना बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी। उस समय क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के कारण ये ऐसा नहीं कर सके। उच्च शिक्षित होने के कारण ये किस तरह हर प्रकार की तकनीक को समझ कर उसका उपयोग कर पाते थे इसका प्रमाण भी देखिए। उमर उन नबी, डॉ.मुजम्मिल गनई और डॉ.शाहीन शाहिद ने स्विट्जरलैंड के थ्रीमा नाम के एपिप्टेड ऐप से बातचीत की थी।

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थ्रीमा ऐप से गुप्त बातचीत और धमाके की योजनाएं साझा की गईं

इसी ऐप के जरिए वे धमाके की योजना, नक्शे सहित आवश्यक दस्तावेज व जानकारियां साझा कर रहे थे। थ्रीमा ऐप फोन नंबर या ईमेल के बिना काम करता है और हर यूजर को एक यूनिक आईडी देता है, जिससे उसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। हम और आपमें से कितने लोगों ने थ्रीमा ऐप का नाम सुना है या उपयोग किया है? पता नहीं अभी इसमें और क्या-क्या जानकारियां सामने आएंगी। डॉक्टर बनने वाला कोई व्यक्ति छात्र के रूप में थोड़ा मेधावी तो होगा ही।

इमरान मसूद जैसे नेता इनको भटका हुआ बता दें या हुसैन दलवई जैसे मुस्लिम नेता कहें कि चुनाव के पहले ही विस्फोट क्यों होता है, यह कहा जाए कि आप इसको इस्लामी आतंकवाद ना कहिए तो क्या उत्तर दिया जा सकता है? पुलिस की छानबीन में उनके पहले किसी अपराधी से संपर्क आदि की भी जानकारी नहीं है। एक डॉक्टर को समाज में इज्जत मिलती है और उसकी गतिविधियों पर सहसा संदेश नहीं किया जा सकता।

आखिर कानपुर में किसने सोचा होगा कि डॉक्टर शाहीन शाहिद जैश-ए-मोहम्मद की इतनी बड़ी आतंकवादी होगी और उसके पास एक-47 जैसा हथियार होगा? सामने आया है कि धमाके के लिए 20 से 25 लाख रुपए इकट्ठा करने में उसकी प्रमुख भूमिका थी। इसमें हरियाणा और पंजाब से लेकर दिल्ली, गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश तक आसानी से लोग आतंकवादी बन जाते हैं तो इसका कारण समझने के लिए अंतरिक्ष विज्ञानी होना आवश्यक नहीं है।

स्थानीय और पारिवारिक सहयोग के बिना मॉड्यूल का बढ़ना असंभव

बगैर स्थानीय और परिवार के लोगों के सहयोग के इतना बड़ा तंत्र खड़ा हो ही नहीं सकता। फरीदाबाद के धौज मस्जिद के इमाम इश्तियाक और सिरोही मस्जिद के इमाम इमामुद्दीन अगर आतंकवाद इस्लाम का काम या जिहाद मानकर उनकी मदद कर रहे थे तो क्यों? इन लोगों ने मिलकर पूरी अलफलाह यूनिवर्सिटी को ही आतंकवाद के बड़े केंद्र में बदल दिया था। पठानकोट से गिरफ्तार डॉक्टर रईस अहमद भी पहले अलफलाह यूनिवर्सिटी में काम करता था।

इसी तरह हापुड़ के जीएस मेडिकल कॉलेज से गिरफ्तार डॉक्टर फारूक अहमदार अल-फलाह यूनिवर्सिटी में सीनियर रेजिडेंट रह चुका है। वह जम्मू-कश्मीर के बीरवाह जिले के बडगांव, वीरिपुरा का रहने वाला है। डॉ मुजम्मिल जब विस्फोटक जमा कर रहा था तो किसी ने उसको टोका तक नहीं। पुलिस को बताया गया कि जब उससे पूछा तो कहा कि खेती का खाद रख रहे हैं और इसे जम्मू-कश्मीर ले जाना है। जब मजहब के चेहरे इमाम तक इसमें शामिल हों तो रोक-टोक होगी कहां से।

कोई कह सकता है कि परिवार की इसमें भूमिका नहीं है। डॉ उमर नबी के मोबाइल को तोड़ कर फेंकने वाला परिवार ही था। एनआईए को उसके भाई ने बताया कि डॉ उमर नबी यहां आया था और उसने कहा था कि अगर मेरे बारे में कोई समाचार आए तो मोबाइल को नष्ट करके पानी में फेंक देना और हमने फेंक दिया। क्या भाई और परिवार ने उससे नहीं पूछा कि कौन सा समाचार आएगा? क्या समाचार आने के बाद उनका दायित्व नहीं था कि पुलिस के पास मोबाइल पहुंचायें? आखिर उसने तो अपने को उड़ा लिया था और उसे बचाने की भी समस्या नहीं थी? इसी तरह डॉक्टर शाहीन का भाई डॉ परवेज की भूमिका अभी तक संदिग्ध मानी जा रही है। सीसीटीवी फुटेज बता रहे हैं कि उमर नबी धमाके से पहले हरियाणा के मेवात गया था।

आतंकी मॉड्यूल पर समाज की आक्रामक व विभाजित प्रतिक्रियाएँ

फिरोजपुर झिरका टोल प्लाजा फुटेज में उसकी कार दिखाई दी, जिसमें विस्फोटक सामग्री भरी हुई थी। यह फुटेज 10 नवंबर की सुबह, यानी धमाके वाले दिन की है। जांच में पता चला है कि मेवात क्षेत्र-गुरुग्राम, नूंह और आसपास से ही 20 क्विंटल से ज्यादा अमोनियम नाइट्रेट खरीदा गया था। विस्फोटक में इस्तेमाल की गई खाद भी उमर ने मेवात से ही खरीदी थी। स्वयं को कार में उड़ाने के पूर्व उमर नबी का मेवात जाना, होटल में भोजन करना, काफी देर तक रुकना आदि के कोई निहितार्थ हैं या नहीं?

इन सबके बावजूद अगर आक्रामक रूप में प्रतिक्रिया आती है कि इस मुद्दे को बड़ा नहीं बनाया जाए और मुसलमान या एक समुदाय को बदनाम नहीं किया जाए तो यह देश की सामान्य स्थिति नहीं है। कोई सांसद उन्हें भटका हुआ बता रहे हैं तो कोई कह रहे हैं कि अभी इसके प्रमाण क्या हैं.. किसी का तर्क है कि पहले भी आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार लोग लंबे समय बाद रिहा किए गए हैं …क्या हिंदुओं ने आतंकवाद नहीं किया है..आदि आदि।

अवधेश कुमार
अवधेश कुमार

सच कहें तो इस तरह की प्रतिक्रियायों को उन आतंकवादियों के उन्मादी, जेहादी विचारों और हिंसक कृत्यों से भी ज्यादा खतरनाक माना जाना चाहिए। ऐसी प्रतिक्रियाएं ही ऐसे तत्वों का हौसला बढ़ाती है। देश हम सबका है और सभी को विचार करना पड़ेगा कि आखिर आतंकवाद से प्रत्यक्ष संघर्ष की बजाय ऐसी प्रतिक्रियाओं से उनके परोक्ष समर्थन के व्यापक व्यवहार से कैसे निपटा जाए। अभी एक मॉड्यूल हमारे सामने आया है। निश्चित मानिए ऐसे कई मॉड्यूल देश के अलग-अलग जगहों में सक्रिय होकर साजिशों को अंजाम देने में संलिप्त होंगे। किसी तरह वे कुछ करने में सफल हुए या साजिश अंजाम देने के पहले पकड़े गए तब भी सामूहिक प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी।

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