पतियों की प्रधानी : चलेगी या जाएगी?

भारतीय लोकतंत्र के भव्य रंगमंच पर, समानता और सशक्तीकरण के वादों के बीच पिछले कुछ दशकों में प्रधान पति के रूप में एक अजीबोगरीब नई संस्था उभर कर सामने आई है। यह किरदार न तो चुना जाता है, न ही जवाबदेह होता है; फिर भी इसने ग्राम पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों से सत्ता छीन ली है। हाल ही में सरकार द्वारा गठित एक समिति की रिपोर्ट ने इस हास्यास्पद प्रथा को उजागर किया है।

कल्पना कीजिए, एक गाँव में लोगों ने बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक महिला को प्रधान चुना।पूरे गाँव में नई उम्मीदों की गूँज है, परिवर्तन की हवा बह रही है। लेकिन जैसे ही मंच का पर्दा उठता है, फैसले लेने, बैठकों में भाग लेने और सत्ता चलाने के लिए कौन सामने आता है? वह महिला प्रधान नहीं, बल्कि उनका पति-स्वयंभू प्रधान पति।

प्रधान पति प्रथा: लोकतंत्र पर पर्दे के पीछे की साजिश

यह वैसा ही है जैसे नाटक के मुख्य कलाकार को धक्का देकर स्टेज पर कोई दूसरा ही अपना अभिनय दिखाने लग जाए, वह भी बिना किसी ऑडिशन के! न; यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में प्रथा के रूप में स्वीकृत सामान्य परिघटना है।

यहाँ प्रधान पति पूरी राजनैतिक धाक के साथ पंचायत चलाते हैं, जबकि निर्वाचित महिला को पर्दे के पीछे धकेल दिया जाता है। 1992 में लागू हुए 73वें संविधान संशोधन ने पंचायत राज संस्थानों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करके उन्हें नेतृत्व का मौका दिया था। लेकिन असल में हुआ क्या? हमने माइक ऐसे लोगों को थमा दिया, जिनका नाम एजेंडे पर कहीं था ही नहीं!

ग़ौरतलब है कि सरकार द्वारा गठित समिति ने इस अलोकतांत्रिक प्रथा को रोकने के लिए उदाहरणीय दंड लागू करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि प्रधान पतियों को पंचायत के कामकाज से दूर रखने के लिए सख़्त निगरानी तंत्र, तकनीक आधारित समाधान और प्रधान पति विरोधी नायकों को पुरस्कृत करने की नीति अपनाई जानी चाहिए।

तकनीक और सख्ती से खत्म होगी प्रधान पति प्रथा?

वर्चुअल रियलिटी प्रशिक्षण, क्षेत्रीय भाषाओं में एआई-संचालित कानूनी मार्गदर्शन और निर्वाचित महिला प्रधानों को अधिकारियों से जोड़ने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप जैसी तकनीकी पहल की सिफारिश की गई है।कैसी विडंबना है कि हमें हकीकत को स्वीकार कराने के लिए अब वर्चुअल रियलिटी का सहारा लेना पड़ रहा है!

एआई को कानूनी मार्गदर्शन देना पड़ रहा है, क्योंकि इंसानी सलाहकार शायद अब भी पितृसत्ता के जाल में उलझे हुए हैं! समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि ग्राम सभाओं में सार्वजनिक रूप से महिला प्रधानों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाए, ताकि पूरे गाँव को यह स्पष्ट हो जाए कि असली प्रधान कौन है।

शायद इस मौके पर प्रधान पति के लिए एक विशेष कुर्सी भी रखी जाए, जिस पर लिखा हो मैं सिर्फ देखने आया हूँ! इसके अलावा, समिति ने प्रधान पति प्रथा का मुकाबला करने वाले लोगों के लिए वार्षिक पुरस्कार और गणतंत्र दिवस पर उत्कृष्ट महिला नेताओं को राष्ट्रीय सम्मान देने की सिफारिश की है। कल्पना कीजिए, एक भव्य कार्पाम चल रहा है।

प्रधान पति प्रथा: क्या सचमुच इतिहास बन पाएगी?

महिला प्रधानों को सम्मानित किया जा रहा है, और उनके पति दर्शकों में बैठे हुए तिलमिलाते हुए ताली बजा रहे हैं। आप चाहें तो इसे चुटकुला समझकर हँस सकते हैं। लेकिन इस कल्पना के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। प्रधान पति प्रथा न केवल लोकतंत्र का मजाक उड़ाती है, बल्कि महिलाओं के सशक्तीकरण की पूरी अवधारणा को भी कमजोर करती है।

इससे पता चलता है कि पितृसत्ता, कानून को धता बताते हुए, कितनी चतुराई से महिलाओं को नेतृत्व से बाहर करने के नायाब तरीके खोज लेती है। समिति ने बताया है कि महिलाओं की शिक्षा में कमी, कानूनी जागरूकता की अनुपस्थिति और सामाजिक प्रतिरोध इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं। माना कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है।

लेकिन प्रथाएँ और रूढ़ियाँ आसानी से टूटती हैं क्या? समिति की सिफारिशें निश्चित रूप से सही दिशा में एक कदम हैं। लेकिन असली परीक्षा अब अमल की होगी। क्या प्रधान पति स्वेच्छा से सत्ता छोड़ देंगे, या फिर किसी न किसी बहाने मंच पर बने रहने की कोशिश करेंगे? क्या इन प्रयासों से यह प्रथा सचमुच इतिहास बन जाएगी, या फिर पंचायतों के गलियारों में इसकी गूँज बनी रहेगी?

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