भारतीय दंत-कथाओं के अमर किरदार

पिछले दिनों एक पुस्तक के विमोचन समारोह में जाने का अवसर मिला। वहाँ जो किताब छपकर आयी थी, उसे देखकर मैं अपने बचपन में पहुँच गया, क्योंकि किताब का नाम था- लालबुझक्कड़ के किस्से! यह लालबुझक्कड़ लोक-कथाओं के ऐसे किरदार हैं, जिनके ढेर सारे किस्से हम बचपन की गर्मियों में गाँव के चबूतरे पर और सर्दियों की रात में अलाव की गर्माहट में सुन चुके थे।
किस्सागोई सिर्फ अपने देश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह परंपरा संसार के कोने-कोने में विद्यमान रही है। हर एक देश में किस्सों के लालबुझक्कड़ जैसे पात्र मिलते हैं, जिनके इर्द-गिर्द बहुत-सी कहानियाँ बुनी गईं और सैकड़ों साल बाद भी वह लोक-मानस में जीवित हैं। पिछले चार-पाँच दशक से किस्सों के कहने-सुनने के स्वर मंद पड़ने लगे थे। लिहाजा स्वीडन में सन् 1991 में किस्सागोई की कला को बचाए रखने के लिए 20 मार्च को राष्ट्रीय किस्सागोई दिवस के रूप में मनाया गया था।
बाद में मानव सभ्यता की इस विरासत की संरक्षा के लिए यूनेस्को के तत्वावधान में सन् 2001 से प्रति वर्ष 20 मार्च को विश्व किस्सागोई दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। हम अपने बचपन में जिन लालबुझक्कड़ की कहानियाँ सुनते थे, वह अवधी और भोजपुरी भाषा की दंतकथाओं के एक अमर पात्र हैं, यह अपनी बात से रोते हुए को हँसाने और खुश कर देने की क्षमता रखते हैं। इसकी शुरुआती कथा कुछ इस तरह है, एक गाँव में लालबुझक्कड़ नाम का एक आदमी रहता था।
गाँव के लोग उसे ज्ञानी मानते थे। उनकी हर समस्या का समाधान उसके पास होता था, जिसे वह कविता में बताता था। एक बार रात में गाँव से हाथी गुजरा, धूल भरे रास्ते पर उसके पैरों के निशान बन गये। सवेरे गाँववालों को यह बड़े-बड़े गोल निशान दिखे, सबको हैरत हुई कि आखिर यह है क्या? इसका रहस्य जानने सब लालबुझक्कड़ के पास पहुंचे। वह मौके पर पहुंच, निशान देखे। कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले- लालबुझक्कड़ बूझ गयो और न बूझे कोय। पैर में चक्की बांध के हिरना कूदा होय।। उनके कहने का आशय यह है कि मैं इसको समझ गया, और कोई समझ ही नहीं सकता।
यह हिरण की करतूत है, जो अपने पैरों में आँटा पीसने की चक्की बांधकर इधर-उधर कूदा है। समस्या का इतना सुंदर समाधान पाकर ग्रामवासी उनकी बुद्धि का जैकारा लगाते चले गए। लालबुझक्कड़ जानते कितना थे, यह तो जगजाहिर है। उनकी खासियत है, वह यह नहीं कह सकते कि मैं इसके बारे में अनजान हूँ। वह अपनी बुद्धि से समस्याओं का ऐसा हास्यास्पद और चमत्कार भरा समाधान खोज लाते हैं, जो सुनने वाले को हँसाता और गुदगुदाता है। यानी न जानते हुए भी जानकारी देना कितना मजेदार हो सकता है, इसे कोई लालबुझक्कड़ से जाने। बाद में किताबों और पत्रिकाओं में भी लालबुझक्कड़ की कहानियाँ छपीं।
टेलीविजन में बच्चों के कार्पाम में भी लालबुझक्कड़ का प्रदर्शन हो चुका है। इसी तरह के शेखचिल्ली भी दंतकथाओं का चुहल पैदा करने वाला एक पात्र है। यह अकल के पीछे लट्ठ लेकर घूमता है। अपने हर कारनामे से लोगों में हंसी और मुस्कुराहट पैदा कर देता है, जबकि एक शेखचिल्ली और हैं, जिनकी कहानियाँ बड़ी अर्थपूर्ण होती हैं। वास्तव में दूसरे वाले शेखचिल्ली ऐतिहासिक सूफी संत हैं। यह दिल्ली के थे और उनका वास्तविक नाम अब्द उर्र रहीम था। वह अत्यंत विद्वान और मुगल बादशाह शाहजहाँ के बड़े पुत्र दाराशिकोह के गुरु थे।
बंगाल में किस्से-कहानियों की दुनिया में गोपाल भाँड़ का बड़ा नाम है। यह नदिया जिले में स्थित कृष्णनगर के राजा कृष्णचंद्र राय के दरबारी थे। इनसे जुड़े विनोदपूर्ण और बुद्धिमानी के किस्से प्रसिद्ध हैं। यह हाजिर जवाब और चतुर थे। कहानियों से जुड़े वास्तविक लोगों में बिहार के गोनू झा भी बड़े मानिन्द हैं। सारे देश में इनके किस्से कहे-सुने जाते हैं। इनकी कहानियों में
हास्य-व्यंग्य और बुद्धिमानी से भरे कारनामे मिलते हैं। गोनू झा सन् 1276 से 1325 ई. के बीच उत्तरी बिहार और नेपाल में स्थित सिमरांवगढ़ के राजा शक्तिसिंह देव और हरिसिंह देव के राज दरबारी थे।
देश में बीरबल के किस्से भी प्रचलित हैं। इनका वास्तविक नाम महेशदास था। यह अकबर के नवरत्नों में एक थे। इनका जन्म मध्यप्रदेश के घोंघरा गाँव में 1528 ईस्वी में हुआ था। इनकी पत्नी उर्वशी देवी थीं और संतान के रूप में एकमात्र पुत्री सौदामिनी का उल्लेख मिलता है। यह विद्वान, कवि और तीव्र बुद्धि के थे। यह बहादुर भी थे, जिससे प्रसन्न होकर अकबर ने इनको बीरवर की उपाधि दी थी, जो बाद में बिगड़कर बीरबल बन गई। सन् 1586 की 16 फरवरी को बीरबल पश्चिमोत्तर सीमा पर काराकर में यूसुफ जई कबीले के विद्रोह को दमन करने वाली लड़ाई में मारे गए थे।
ऐतिहासिक पात्रों में तेनालीराम के किस्से भी रोचक, तर्कपूर्ण और वाक्पटुता से भरपूर होते हैं। इनका असली नाम
रामकृष्ण पिल्लै था। दक्षिण के विजयनगर राज्य के महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में तेनाली की नियुक्ति सलाहकार और
विद्वान के रूप में हुई थी। यह दरबार के तेलुगु कवियों के समूह अष्टदिग्गजों में एक थे। इनका जन्म 1480 ईस्वी में हुआ था। करीब 47 साल की अवस्था में 5 अगस्त 1528 ईस्वी में सर्पदंश से उनकी असामयिक मृत्यु हो गई थी। तेलुगु में उनका लिखा पांडुरंग महात्म्यम उच्चकोटि का महाकाव्य है।
आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में तेनाली नामक शहर में नगर पालिका के पास इनकी प्रतिमा स्थित है। विजांडो भी एक बुद्धिमान कथापात्र है। मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड से म्यांमार तक इसकी कहानियाँ कही-सुनी जाती हैं, जिनमें समस्याओं के तार्किक और बुद्धिमत्तापूर्ण समाधान होते हैं। मुल्ला नसीरुद्दीन और आ़फंती की तर्क, चुहलबाजी और बुद्धि से जुड़ी कहानियाँ देशभर में बिखरी पड़ी हैं। यह जनाब नसरुद्दीन होजा और ख्वाजा नासिरुद्दीन के नाम से भी जाने जाते हैं। आ़फंती अपनी कहानियों में अक्सर हास्य-व्यंग्य की छटा बिखेरते हैं। इन दोनों का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं मिलता है।
हरियाणा के देसा के किस्सों में पाखंड का विरोध और तर्क की प्रधानता रहती है। गांवों में बहराम चोट्टा के नाम से काफी संख्या में किस्से मिलते हैं, जिसमें कलाकार चोर बहराम की कारस्तानी होती है। लोगों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करने वाले बैगा की कहानियाँ ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में के गांवों में बिखरी पड़ी हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश और ब्रज क्षेत्र में गंगाराम पटेल और बुलाकी नाई की कहानियाँ कही-सुनी जाती रही हैं। यह प्राचीन यात्रा कथाएं हैं। नक्कारे के साथ मंच से इसका गायन और प्रदर्शन भी होता है। यह अलग तरह की कहानियाँ होती हैं।
इसका ढांचा कुछ इस तरह का है, गंगाराम पटेल यात्रा पर निकले हैं। बुलाकी नाई उनका सेवादार है। यात्रा पर निकलने के पहले बुलाकी ने यह शर्त रखी थी कि पटेल साहब उसकी किसी गुत्थी का हल निकालने में असफल हो जाएंगे तो वह आगे की यात्रा में सहभागी नहीं बनेगा, वहीं से घर वापसी कर देगा। पटेल ने शर्त मंजूर कर ली थी। रोज शाम को पटेल रात्रि विश्राम के लिए पड़ाव डालते थे। बुलाकी उनसे पैसा लेकर खाने-पीने का समान लाने बाजार चला जाता और एक विचित्र घटना पटेल के सामने रख देता था। पटेल उसकी शंका का समाधान कर देते।
दादी-नानी की लोक-कथाएं हों या किताबों में दर्ज ऐतिहासिक- पौराणिक गाथाएं, हर कथा जीवन को समझने की नई दृष्टि देती है। बचपन में जो कहानियाँ सुनते थे, वह हमारे मन में सपनों के बीज बोती थीं। कहानियों की दुनिया बहुत बड़ी है, रहस्य-रोमांच और मनोरंजन से भरी हुई!
-दिनेश प्रताप सिंह चित्रेश
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