वैश्विक सुस्ती के बीच भारत की बुलंद उड़ान
आज जब हम दुनिया के नक्शे पर नज़र डालते हैं, तो मंज़र बहुत साफ़ दिखाई देता है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश, जो कभी दुनिया की अर्थव्यवस्था का इंजन हुआ करते थे, आज मंदी की आहट और कमरतोड़ महँगाई से जूझ रहे हैं। चीन अपनी अंदरूनी चुनौतियों में उलझा है और जापान सुस्ती का शिकार है। ऐसे अनिश्चित माहौल में, अगर कहीं उम्मीद की सबसे चमकदार किरण दिखाई दे रही है, तो वह भारत है।
हाल ही में आए ताज़ा आँकड़े और अनुमान किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में 7.3 प्रतिशत की रफ़्तार से दौड़ती रही और आगे 2026 और 2027 में भी 6.4 प्रतिशत की मज़बूत दर कायम रहेगी। ये सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि भारत की बदलती तकदीर और तस्वीर का सबूत हैं।
वैश्विक मंदी में भारत की मज़बूत अर्थव्यवस्था की बुनियाद
आम नागरिक के लिए यह समझना ज़रूरी है कि जब दुनिया साँस लेने के लिए संघर्ष कर रही है, तब भारत का दौड़ना कितना मानीखेज़ है। इसका सीधा मतलब यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था की बुनियाद बहुत मज़बूत है। यह रफ़्तार सिर्फ़ किस्मत का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले कुछ सालों में हुए कड़े फ़ैसले और ज़मीनी काम हैं। इस रिपोर्ट का सबसे गहरा अभिप्राय यह है कि भारत अब दुनिया की बैसाखी के सहारे नहीं चल रहा।
हमारी ग्रोथ का इंजन हमारा अपना घरेलू बाज़ार है। हमारे देश में 140 करोड़ लोग हैं, जिनकी ज़रूरतें और खपत ही हमारी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही हैं। दुनिया में मंदी हो भी जाए, तो भी भारत के गाँव-शहर अपनी रफ़्तार बनाए रखने का माद्दा रखते हैं। अगर हम इस सफलता की गहराई में जाएं, तो तीन बड़ी वजहें सामने आती हैं। पहली, डिजिटल ाढांति! जिस तरह से भारत में गाँव-गाँव तक डिजिटल लेन-देन पहुँचा है, उसने व्यापार को आसान और पारदर्शी बना दिया है। आज रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर बड़े शोरूम तक, पैसा घूमने की रफ़्तार बढ़ गई है।
दूसरी, बुनियादी ढाँचा! सड़कों, हाइवे और रेलवे पर जो बेहिसाब काम हो रहा है, उसने न सिर्फ़ रोज़गार पैदा किए हैं, बल्कि कारोबार की लागत को भी कम किया है। तीसरी, मैन्युफैक्चरिंग पर ज़ोर! मेक इन इंडिया और पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) जैसी योजनाओं ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत सिर्फ़ एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक कारखाना भी बन सकता है।
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आर्थिक मज़बूती का असर शेयर और सरकारी ख़ज़ाने तक नहीं
सयानों की मानें तो, इस आर्थिक मज़बूती का असर सिर्फ़ शेयर बाज़ार या सरकारी ख़ज़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर बहुआयामी होगा। यह तो मानी हुई बात है कि जब देश की जेब भरी होती है, तो दुनिया उसकी बात ज़्यादा ध्यान से सुनती है। अत 7.3 प्रतिशत की ग्रोथ भारत को वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तें मनवाने की त़ाकत देगी। यही वजह है कि चीन से मोहभंग महसूस कर रहे विदेशी निवेशकों के लिए भारत अब सबसे पहली पसंद बन रहा है। हालाँकि, विकास दर का असली फ़ायदा तभी है जब यह आम आदमी की जेब तक पहुँचे। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस रफ़्तार से नौकरियों के नए दरवाज़े खुलेंगे और लोगों की आमदनी बढ़ेगी।
अंतत यह भी कहना ज़रूरी है कि भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था की यह तस्वीर सुनहरी है, लेकिन ज़मीन की हकीकत से नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं। आर्थिक असमानता अब भी एक बड़ी चुनौती है। यह सुनिश्चित करना सरकार और समाज की ज़िम्मेदारी है कि यह 7.3 प्रतिशत की ग्रोथ सिर्फ़ कुछ बड़े शहरों या उद्योगपतियों तक सिमट कर न रह जाए। इसका फ़ायदा खेत-खलिहान और छोटे कस्बों तक पहुँचना ज़रूरी है। साथ ही, महँगाई को काबू में रखना एक बड़ी परीक्षा होगी, क्योंकि तेज़ रफ़्तार अक्सर अपने साथ महँगाई की धूल भी उड़ाती है!
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