ईरान की ज़िद बनाम अमेरिका की घुड़की
यों तो पश्चिम एशिया की राजनीति में बयानबाजी कभी ठंडी नहीं पड़ती। लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का ताजा बयान कूटनीतिक हलकों में बड़ी खलबली मचाने वाला है। अराघची ने दो-टूक कहा है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को कभी नहीं रोकेगा, चाहे उस पर युद्ध ही क्यों न थोप दिया जाए! यह महज राजनीतिक जुमला नहीं, बल्कि वाशिंगटन के लिए एक कड़ा संदेश है कि तेहरान अब दबाव की राजनीति के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है।
गौरतलब है कि 2015 के परमाणु समझौते से 2018 में अमेरिका के हटने के बाद से ही दोनों देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है। ट्रंप प्रशासन के मैक्सिमम प्रेशर से लेकर बाइडन प्रशासन की सशर्त वापसी की कोशिशों के बीच ईरान ने खुद को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग महसूस किया है, जिसका नतीजा आज इस आाक्रामक तेवर के रूप में सामने है।
ईरान की रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय अस्मिता पर जोर
दरअसल, अराघची का यह रुख ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की रिपोर्टें लगातार चेतावनी दे रही हैं कि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की शुद्धता को उस स्तर तक पहुँचा लिया है, जहाँ से परमाणु हथियार बनाना महज एक तकनीकी औपचारिकता रह जाती है। ईरान का तर्क भले ही यह हो कि उसका कार्यक्रम नागरिक और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन युद्ध से नहीं डरने की हुंकार रणनीतिक स्वायत्तता की उस मंशा को दर्शाती है जहाँ परमाणु तकनीक अब उसकी राष्ट्रीय अस्मिता का हिस्सा बन चुकी है।
इस बयान का एक गहरा मतलब यह भी है कि इराक या अफगानिस्तान के विपरीत, ईरान के साथ कोई भी सैन्य टकराव पूरे मध्य पूर्व को ऐसी आग की लपटों में झोंक सकता है, जिसे बुझाना किसी के वश में नहीं होगा! सयाने आशंकित हैं कि यदि ईरान अपनी इस ज़िद पर अड़ा रहता है और अमेरिका अपनी धमकियों को हकीकत में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो इसके वैश्विक परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
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ईरान का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर प्रभाव, वैश्विक तेल बाजार प्रभावित
ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग – स्ट्रेट ऑफ होर्मुज- पर खासा प्रभाव रखता है; युद्ध की आहट मात्र से वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मच सकता है, जिससे भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर महँगाई का सीधा बोझ पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, यदि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आधिकारिक तौर पर आगे बढ़ता है, तो क्षेत्र में सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों के बीच हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो जाएगी, जो वैश्विक सुरक्षा ढाँचे को छिन्न-भिन्न कर सकती है। यही नहीं, अराघची ने कभी नहीं रोकेगा कहकर, कूटनीति के उन दरवाजों को भी बंद करने का संकेत दिया है, जिनके जरिए पिछले कई दशकों से समाधान की उम्मीदें टिकी थीं। इसे शुभ संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता न?
कुल मिलाकर, इस वक़्त ईरान-अमेरिका संबंध बेहद खतरनाक मोड़ पर हैं। ईरान की हठधर्मिता और अमेरिका की सैन्य घुड़कियाँ किसी भी पक्ष को विजेता नहीं बनाएँगी। ईरान को यह समझना होगा कि आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रही उसकी जनता एक लंबे और विनाशकारी युद्ध का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है, वहीं अमेरिका को यह स्वीकार करना होगा कि धमकियों के जरिए ईरान की सत्ता को झुकाना अब मुमकिन नहीं है। जरूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मध्यस्थ देश दोनों पक्षों को युद्ध के मैदान के बजाय फिर से संवाद की मेज पर लाएँ। वरना इतिहास हमें एक टाले जा सकने वाले संकट को न टाल पाने का दोषी मानेगा!
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