ये डर पैदा करना जरूरी है!


स्वतंत्रता दिवस पर अपने 98 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहाँ दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत के सशत्त होने से किसी को डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह युद्ध का नहीं बल्कि बुद्ध का देश है, वहीं पूरी दृढ़ता से यह भी कहा कि बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों के मन में कठोर दंड का डर होना चाहिए। उन्होंने दुःख और आक्रोश के साथ कहा कि अब समय की माँग है कि ऐसा (बलात्कार) करने वाले दोषियों की भी व्यापक चर्चा हो, ताकि ऐसा पाप करने वालों को भी डर हो कि उन्हें फाँसी पर लटकना पड़ेगा। मुझे लगता है कि ये डर पैदा करना जरूरी है।' साथ ही यह भी किभ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई जरूर होगी। मैं उनके लिए भय का वातावरण पैदा करना चाहता हूँ।’ कहना न होगा कि इन अपराधों के अपराधियों में डर या भय पैदा करने का प्रधानमंत्री का आह्वान इस तरह के व्यवहार को रोकने और कानून तथा व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल करने के उद्देश्य से एक सख्त दृष्टिकोण को दर्शाता है। साथ ही, इससे शासन, न्याय और सामाजिक मूल्यों के बारे में कुछ अहम सवाल भी उठते हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा डर' को निवारक के रूप में महत्व देने से उनकी इस धारणा का पता चलता है कि सख्त दंडात्मक उपायों से इन अपराधों में उल्लेखनीय कमी आएगी। यह नजरिया एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसका मक़सद कानून के शासन को मजबूत करना और मजबूत शासन की छवि पेश करना है। प्रधानमंत्री का कार्रवाई का आह्वान, न्याय की धीमी गति और अपराध तथा भ्रष्टाचार से निपटने में मौजूदा तंत्र की अक्षमता के प्रति बढ़ती निराशा को दर्शाता है। प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के महिमामंडन की आलोचना की और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के प्रति कठोर होने की तत्काल जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों से निपटने में कठोर दंड काडर’ एक महत्वपूर्ण तत्व होना चाहिए। यह दृष्टिकोण गंभीर अपराधों से निपटने में कमजोर और अक्षम मानी जाने वाली प्रणाली को सुधारने की इच्छा के अनुरूप है।

हालाँकि, डर' पैदा करने के पीछे की मंशा स्पष्ट है, लेकिन इसके क्रियान्वयन और व्यापक निहितार्थों पर सावधानीपूर्वक विचार करने की जरूरत है। न्याय के साधन के रूप में डर एक ऐसे अधिक दमनकारी कानूनी माहौल को जन्म दे सकता है, जिसमें पुनर्वास और प्रणालीगत सुधार से ध्यान हटाकर दंडात्मक उपायों पर ध्यान केंद्रित किया जाता हो। इस दृष्टिकोण से न्याय और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के कमजोर होने का जोखिम है। यानी अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत और मूलभूत कानूनी अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भय-आधारित दृष्टिकोण के आलोचकों का तर्क है कि इससे न्यायिक निष्पक्षता का क्षरण हो सकता है और कानूनी प्रणाली के भीतर समस्याएँ बढ़ सकती हैं। उन्हें इस बात की चिंता है कि डर पैदा करने के लिए सजा की धारणा कहीं अपराध और भ्रष्टाचार से निपटने के समग्र दृष्टिकोण के लिए जरूरी निवारक और सहायक उपायों पर हावी न हो जाए। ध्यान रखना जरूरी है कि वही न्याय प्रणाली प्रभावशाली मानी जाती है, जो न केवल अपराधियों को दंडित करे, बल्कि अंतार्निहित कारणों का भी निदान करे और पीड़ितों को सहायता प्रदान करे। प्रधानमंत्री का सुझाव बेहद अहम है, लेकिन उसे मजबूत सुधारों और व्यापक रणनीति के बल की जरूरत होगी, जिसमें रोकथाम, शिक्षा और समर्थन तंत्र शामिल हों। प्रधानमंत्री के संबोधन में राज्य संस्थाओं के भीतर प्रणालीगत सुधार की जरूरत पर भी प्रकाश डाला गया है। राज्य सरकारों कोअत्यंत तत्परता’ से काम करने का उनका सुझाव इस मान्यता पर आधारित है कि अपराध और भ्रष्टाचार के प्रति स्थानीय प्रतिक्रियाएँ अपर्याप्त रही हैं। त्वरित और निर्णायक कार्रवाई का आह्वान करके, प्रधानमंत्री का उद्देश्य राज्य मशीनरी को सक्रिय करना और यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उस गंभीरता के साथ सँभाला जाए जिसके वे हकदार हैं।

फिर भी, डर पैदा करने की प्रभावशीलता इसके कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। इस बात का जोखिम है कि ऐसे उपायों के परिणामस्वरूप प्रशासन को असंगत और मनमाने आचरण की छूट मिल जाए, जिससे मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। `डर’ को एक प्रभावी निवारक बनाने के लिए, इसे निष्पक्ष और पारदर्शी कानूनी प्रक्रियाओं पर आधारित होना चाहिए, जो न्याय और समानता को बनाए रखें।
अंततः, गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत!
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत!

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