जम्मू-कश्मीर : भाजपा का पैंतरा

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की गहमगहमी के बीच जहाँ कुछ सियासी पार्टियाँ नए समीकरण बना रही हैं, तो कुछ को अपना हिसाब-किताब हाथ से खिसक जाने का डर सता रहा है। राज्य (केंद्र शासित) में अनुच्छेद 370 की विदाई के बाद पहली बार चुनाव हो रहे हैं। 90 विधानसभा सीटों के लिए 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को मतदान होगा और परिणाम 4 अक्टूबर को घोषित होंगे।

इस चुनाव के सिलसिले में यह जानना काफी दिलचस्प है कि भगवा पार्टी के लेबल वाली पार्टी, यानी भारतीय जनता पार्टी एक नए पैंतरे के साथ मैदान में उतर रही है। सयाने बता रहे हैं कि भाजपा घाटी की हद तक मुसलमानों पर भरोसा जताती दिख रही है। अगर ऐसा है, तो रणनीतिक स्तर पर यह पार्टी में बड़े बदलाव का सूचक हो सकता है। यदि इस रूप में घाटी में उसे कुछ स्वीकार्यता हासिल होती है, तो उपलब्धि ही कही जाएगी। बताया गया है कि घाटी में भाजपा पहले चरण में केवल 8 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारेगी। ये हैं – कोकरनाग (अजजा) से रोशन हुसैन गुज्जर, कश्मीर घाटी की शंगस-अनंतनाग पूर्व से कश्मीरी पंडित वीर सराफ, पांपोर से इंजीनियर सैयद शौकत गयूर, राजपोरा से अर्शीद भट्ट, शोपियां से जावेद अहमद कादरी, अनंतनाग पश्चिम से मो. रफीक वानी, अनंतनाग से एडवोकेट सैयद वजाहत, श्रीगुफवाड़ा बिजबेहरा से सोफी यूसुफ। बाकी जगहों पर निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देगी। साफ है कि एक ओर से नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन, तो दूसरी ओर से पीडीपी की चुनौती को भाँपते हुए भाजपा कश्मीर घाटी में एक-एक क़दम फूँक-फूँक कर रख रही है।

जगजाहिर है कि जम्मू की तुलना में कश्मीर में भाजपा का जनाधार नगण्य-सा रहा है, क्योंकि वहाँ हिंदू वोट प्रभावी नहीं हैं। इसलिए मुस्लिम वोटरों की निर्णायक भूमिका को देखते हुए जिन कुछ सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है, उसने मुस्लिम उम्मीदवारों को ही आगे किया है। अगर इन्हें सफलता मिलती है, तो यह एक ओर तो इन इलाकों में भाजपा की पैठ बढ़ने का प्रमाण होगा तथा दूसरी ओर भाजपा के रणनीतिक बदलाव का सूचक। याद रहे कि कश्मीर पंचायत चुनाव में भी भाजपा ने मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़े किए थे और कुछ हद तक कामयाबी भी हासिल की थी।
यह तो हुई कश्मीर घाटी की बात। अब कुछ बात जम्मू क्षेत्र की भी कर लें, जहाँ भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं की ओर से घोर प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। देश भर में कई बार झटके खाने के बावजूद भाजपा यहाँ भी स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके बाहरी प्रत्याशियों को आगे करने की होशियारी (गलती) करने से बाज़ नहीं आ रही। सयानों की मानें तो ऐसे पैराशूट प्रत्याशी इलाके में भाजपा के गले की फाँस भी बन सकते हैं। यही वजह है कि कटरा से उतारे जा रहे उम्मीदवार को लेकर पूछे जा रहे कार्यकर्ताओं के सवालों का भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं है।

सयाने बता रहे हैं कि इस इलाके में भाजपा का दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को स्थानीय नेताओं पर तरजीह देना बहुत भारी भी पड़ सकता है। कहीं नई ज़मीन हथियाने के चक्कर में वह खुद की ज़मीन न खो दे। इसलिए नेतृत्व को स्थानीय कार्यकर्ताओं को रुष्ट करने का जोख़िम नहीं उठाना चाहिए। गौरतलब है कि यहाँ भाजपा ने आधा दर्जन सीटों पर दूसरे दल से आए नेताओं को टिकट दिया है, जिसमें नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व प्रांतीय अध्यक्ष देवेंद्र राणा और पीडीपी के पूर्व नेता चौधरी जुल्फिकार, कांग्रेस के पूर्व नेता शाम लाल शर्मा, नेशनल कांफ्रेंस से आए सुरजीत सिंह सलाथिया जैसे नाम शामिल हैं। कहना न होगा कि इन बाहरी लोगों के लिए अंदरूनी की बलि देने की नीति को पचा पाना सामान्य कार्यकर्ता के लिए आसान न होगा!

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