धागों में बुना उजाला

गली के मोड़ पर एक छोटा-सा घर था, जिसकी खिड़की के पास हमेशा एक पुरानी सिलाई मशीन रखी रहती थी। उस मशीन की आवाज़ जैसे उस घर की धड़कन थी। वहीं बैठती थीं, सबकी प्रिय उर्मिला आंटी। उनकी उम्र सत्तर साल हो चुकी थी, लेकिन उनके हाथों की रफ्तार में ज़रा भी कमी नहीं आई। गोरा रंग, आंखों पर मोटा चश्मा, बालों में सफेदी, चेहरे पर झुर्रियां, मगर मन में अटूट विश्वास और चेहरे पर संतोष की चमक।
उनके पास बैठने पर लगता था, जैसे समय ठहर गया हो और जीवन की सारी उलझनें धागों की तरह सुलझने लगी हों। उनके पति, मनसुख अंकल पास ही एक कुर्सी पर बैठे रहते। उन्हें सुनाई कम देता था, पर काम के प्रति उनका लगाव कम नहीं था। कपड़े काटना, नाप लेना, धागे तैयार करना आदि दोनों पति-पत्नी जैसे एक ही लय में काम करते थे। शब्दों से नहीं, बल्कि समझ से बात करते थे। उर्मिला आंटी के तीन बच्चे थे, दो बेटियां और एक बेटा।
बेटियों की शादी का बोझ, बीमार ससुर की दवाइयों तथा घर का खर्च आदि जिम्मेदारियों का पहाड़ था, उनके सामने। मगर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उनके होंठों पर हमेशा एक ही बात रहती- भगवान का लाख-लाख पा है, सब अच्छा है।
बहुत ही संतोषी स्वभाव की थी आंटी। वह बाजार से कम दाम में सिलाई करती थीं। लोग अक्सर कहते- आंटी, आप इतना अच्छा काम करती हैं, थोड़ा रेट बढ़ा लें। लेकिन वह मुस्कुरा कर कहतीं- बेटा, सबकी अपनी-अपनी मजबूरी होती है, अगर मेरा काम किसी के काम आ जाए, तो यही सबसे बड़ी कमाई है। उनके हाथों में सचमुच जादू था।
हर कपड़ा ऐसा फिट बैठता जैसे उसी के लिए बना हो। मेरी पत्नी वंशिका भी अक्सर उनके पास सूट सिलवाने जाती थी, लेकिन अब उसका जाना सिर्फ सिलाई तक सीमित नहीं रहा। वह टीचर बनने की तैयारी कर रही थी और जब भी आंटी के पास जाती, तो वह बड़े स्नेह से उसे देखतीं। एक दिन आंटी ने वंशिका का चेहरा गौर से देखते हुए कहा- बेटी! तुम बहुत अच्छी हो, बिल्कुल मेरी बेटी जैसी। तुम्हारी बोली में बहुत मिठास है। तुम मेरा भी बहुत आदर करती हो और मेहनती भी खूब हो। मेरा आशीर्वाद है-तुम देखना, एक दिन जरूर सरकारी नौकरी में लग जाओगी।
उनकी बात सुनकर वंशिका हल्के से मुस्कुरा दी, लेकिन उसके मन में जैसे एक नई ऊर्जा भर गई। वह जब भी थक जाती, तो आंटी के ये शब्द उसे फिर खड़ा कर देते। उधर, घर में संघर्ष जारी था। एक दिन वंशिका ने देखा कि आंटी के घर के एक कोने में एक बुजुर्ग खाट पर लेटे थे। वह उर्मिला आंटी के ससुर थे। चल-फिर नहीं सकते थे। उनकी देखभाल, दवाई आदि की जिम्मेवारी आंटी ही उठाती थीं।
वंशिका ने उनसे कहा- थक जाती होंगी आप? उर्मिला आंटी हल्के से हंसीं और कहा- थकान तो होती है बेटा। अब उम्र भी हो चली है, लेकिन जब जिम्मेदारी होती है, तो थकान खुद ही हार मान जाती है। समय बीतता गया। आंटी ने अपनी दोनों बेटियों की शादी बड़े सम्मान के साथ की। अब उम्मीद बेटे से थी। बेटा नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था, मगर उसे नौकरी नहीं मिल रही थी। घर में चिंता थी, लेकिन उर्मिला आंटी का विश्वास अडिग था।
वह कहती थीं- समय लगेगा, लेकिन मेहनत कभी खाली नहीं जाती। और सचमुच एक दिन खुशखबरी आई कि बेटे आशीष को एक छोटे-से अस्पताल में नौकरी मिल गई है। उस दिन आंटी की आंखों में संतोष के आंसू थे। देखा बेटा, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। धीरे-धीरे घर की स्थिति सुधरने लगी, लेकिन उन्होंने सिलाई का काम नहीं छोड़ा। वह हमेशा कहती थीं कि ये सिर्फ काम नहीं है बेटा, ये मेरा सहारा है, मेरी पहचान है।
इसी बीच वंशिका की मेहनत भी रंग लाई। वह सुबह-सुबह मिठाई का डिब्बा लेकर उर्मिला आंटी के घर पहुंच गई और यह खुशी की खबर सुनाते हुए कहा- आंटी, मुझे नौकरी मिल गई है। वह भी फर्स्ट ग्रेड शिक्षक की! उर्मिला आंटी मशीन से नजर उठाकर उसे देखने लगीं। जैसे ही वंशिका ने मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाया तो आंटी की आंखें चमक उठीं। वह कहने लगीं- सच में बेटी! हाँ आंटी, आपके आशीर्वाद से! आंटी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा- मुझे पता था, मेरी बेटी जरूर सफल होगी।

उस दिन घर में त्योहार-सा माहौल था। मनसुख अंकल भी मुस्कुरा रहे थे। आंटी बार-बार मिठाई का टुकड़ा उठाकर सबको खिला रही थीं, जैसे यह उनकी अपनी जीत हो। आज भी जब मैं उस गली से गुजरता हूं, तो मशीन की वही आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन अब वह आवाज़ सिर्फ कपड़े नहीं सिलती, वह रिश्ते जोड़ती है, हौसले बुनती है और सपनों को आकार देती है। उर्मिला आंटी ने हमें सिखाया कि मेहनत, विश्वास और संतोष अगर साथ हों, तो जिंदगी की कोई भी सिलवट ज्यादा देर तक नहीं टिकती। वाकई! धागों से सिर्फ कपड़े ही नहीं, उम्मीदें भी बुनी जाती हैं।
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