संकल्प से सफलता

हिन्दी साहित्य जगत को गोदान जैसा कालजयी उपन्यास और कई कहानियां देने वाले प्रेमचंद पहले सिर्फ उर्दू में लिखते थे और वह भी नवाब राय नाम से। तब उन्हें हिन्दी बिल्कुल नहीं आती थी। उनके उर्दू कहानी-संग्रह सोज-ए-वतन पर जब अंग्रेज सरकार ने पाबंदी लगा दी, तो उन्होंने अपना नाम नवाब राय से बदलकर प्रेमचंद रख लिया और भविष्य में केवल हिन्दी में कलम चलाने की ठानी।
उनके इस निर्णय की जानकारी जब किसी साहित्यिक-मित्र को मिली तो वे पूछ बैठे- आपको हिन्दी बिल्कुल भी नहीं आती है, तो फिर आप हिन्दी में लिखेंगे कैसे? इस पर प्रेमचंद बोले, उर्दू और हिन्दी जुबान में कोई बुनियादी फर्क तो है नहीं, बस लिपि का फर्क है। इंसान हिम्मत करे तो कोई काम मुश्किल नहीं है और मुझे पूरा भरोसा है कि जल्द ही मैं देवनागरी लिपि सीख लूंगा। प्रेमचंद की कही बात सही निकली और हिन्दी साहित्य जगत सदा-सदा के लिए उनका ऋणी हो गया।
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-धर्मवीर अरोड़ा
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