लिटरेरी फेस्टिवल चर्चा : भारत का विज्ञान और तकनीक में स्वर्णिम सफर
हैदराबाद, वर्तमान समय में भारत विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में प्रगति की ओर अग्रसर है। देश नए-नए क्षेत्र जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भी आगे बढ़ रहा है। ऐसे में आजादी के बाद के दौर में संस्थान बनाने के लंबे इतिहास से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
गत सोमवार को समाप्त हुए हैदराबाद लिटरेरी फेस्टिवल में साइंस एंड द सिटी स्ट्रीम में पैनल डिस्कशन में वक्ताओं ने उक्त विचार व्यक्त किए। स्पेस : द इंडिया स्टोरी के लेखक डॉ. दिनेश सी शर्मा ने कहा कि भारत में वैज्ञानिक कार्यक्रमों के संस्थापकों के पास शुरुआत से ही स्पष्ट विज़न और रास्ता था, जिसके परिणामस्वरूप परमाणु ऊर्जा में अंतरिक्ष के लिए संस्थानों का विकास हुआ। ये संस्थान संसाधनों की कमी, खासकर विदेशी मुद्रा की कमी और 1947 में भारत को विरासत में मिली नौकरशाही के बोझ के साये में बढ़े।
इसरो का अलग कार्य संस्कृति के साथ विकास विक्रम साराभाई द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट-ओरिएंटेड दृष्टिकोण और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के ऐप्लिकेशन विकसित करने पर उनके ज़ोर का नतीजा था, जब भारत के पास रॉकेट या सैटेलाइट भी नहीं था। शर्मा ने कहा कि उन्होंने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीमों को पाला-पोसा, ताकि वे अंतरिक्ष कार्यक्रम विकसित करने के मामले में उनके मन में जो था, उसे पूरा कर सकें।
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होमी जे. भाभा : ए लाइफ के लेखक बख्तियार के दादाभाई ने कहा कि भाभा बहुआयामी व्यक्तित्व थे। एक पुनर्जागरण पुरुष, संगीत प्रेमी और एक कुशल चित्रकार, इसके अलावा एक कुशल वैज्ञानिक और संस्थान निर्माता भी थे। वे एक दूरदर्शी और काम करने वाले दोनों थे। परिचर्चा का संचालन सीसीएमबी की वैज्ञानिक तेजस्विनी धुरडे ने किया।
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