गिलहरी से प्रेरित हुए भगवान बुद्ध
जीवन के रहस्यों को मालूम करने के लिए भगवान बुद्ध ने एक दिन घर छोड़कर जंगल की ओर प्रस्थान किया। वे जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने लगे। भूख-प्यास सब सहन की, लेकिन उनका तप चलता रहा। उन्होंने शरीर को तप की आग में खूब तपाया। रात-दिन आत्म-चिन्तन में लगे रहे। इसी तरह काफी समय गुजर गया। शरीर सूखकर लकड़ी जैसा हो गया, फिर भी उन्हें आत्म ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।
भगवान बुद्ध को आत्मज्ञान नहीं मिला तो वे विक्षुब्ध हो गए। उन्हें अब कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था। वे निराश होकर सोचने लगे, अब हमें ज्ञान नहीं प्राप्त होगा, इसलिए तपस्या छोड़कर घर लौट जाना चाहिए। उनके मन में अब आत्महीनता की बातें घुमड़ने लगी थीं कि हाय, मैंने व्यर्थ में अपने जीवन का काफी समय बर्बाद कर दिया।
शरीर और मन को कितना कष्ट दिया, इसके बाद भी हमें आत्म तत्व जैसी चीज न प्राप्त हो सकी। वे यही सोच-सोच कर अन्तर्द्वन्द्व में झूल रहे थे। शरीर अत्यधिक दुबला और कमजोर हो गया था। इसलिए उनके कदम लड़खड़ा रहे थे। वे चले जा रहे थे कि उन्हें प्यास लगी। रास्ते में एक स्वच्छ जल की झील दिखी। वे पानी पीने के लिए झील के किनारे पहुंचे।
छोटी कोशिश, बड़ा संकल्प
वे थके होने के कारण आराम करने लगे। आराम करने बाद जैसे ही चलने को हुए तो उनकी निगाह एक गिलहरी पर पड़ी, जो झील के किनारे एक अद्भुत कार्य कर रही थी। भगवान बुद्ध ने देखा एक नन्ही-सी गिलहरी झील के जल में अपनी पूंछ भिगो-भिगो कर झील के पानी को बाहर छिड़क रही है और यह असम्भव-सा दिखने वाला कार्य बिना रुके करती ही जा रही थी।
भगवान बुद्ध ने गिलहरी से पूछा- तुम ऐसा क्यों कर रही हो? गिलहरी ने कहा- इसके पानी ने मेरे बच्चों को बहाकर मार डाला है। मैं इसे सुखाकर अपने बच्चों का बदला चुकाउंगी। इतना कहकर वह अपने कार्य में लग गयी। यह देखकर बुद्ध को बहुत आश्चर्य हुआ। वे बोले-बिना किसी बर्तन के इतनी बड़ी झील को क्या सुखा पाओगी?
तुम्हारी नन्हीं-सी पूंछ से तो कुछ ही बूंदें बाहर निकल पाती हैं। कहां इतनी बड़ी झील और कहां तुम्हारी नन्ही-सी पूंछ, फिर तुम्हारी उम्र ही कितनी है? इसमें तो युगों लग जाएंगे। तुम्हारा जीवन व्यर्थ में चला जाएगा। गिलहरी ने निडर होकर उत्तर दिया- यह झील कब सूखेगी। यह मुझे नहीं मालूम और न ही इसकी परवाह ही है। परिश्रम करके अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाना और अंत में विजय प्राप्त करना मेरा उद्देश्य है। मैं जब तक जीवित रहूंगी, अपने कार्य में लगी रहूंगी।
भगवान बुद्ध ने गिलहरी की अद्भुत और साहस भरी बातें सुनी तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। उनके मन में फिर उथल-पुथल होने लगी। वे सोचने लगे कि जब नन्ही-सी गिलहरी अपने अत्यन्त छोटे साधनों से असंभव-सा दिखने वाले कार्य को संभव करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है तो मैं उच्च मन-मस्तिष्क वाला मनुष्य हूं। फिर भला मैं अपना लक्ष्य क्यों प्राप्त नहीं कर सकता? वे तपस्या पूर्ण कर ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से संकल्प लेकर पुन जंगल की ओर लौट गए।
अखिलेश आर्येन्दु
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