मार्क कार्नी की जीत और भारत

कनाडा के 28 अप्रैल, 2025 को संपन्न हुए संघीय चुनावों में मार्क कार्नी के नेतृत्व वाली लिबरल पार्टी की जीत ने भारत-कनाडा रिश्तों के लिए नई उम्मीदें जगाई हैं। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में खालिस्तानी मुद्दे और हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से जुड़े आरोपों के कारण दोनों देशों के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर पहुँच गए थे। कार्नी की जीत और उनकी भारत के प्रति सकारात्मक सोच इस तनाव को कम करने का मौका पेश करती दिखाई दे रही है।

सयाने याद दिला रहे हैं कि ट्रूडो सरकार के दौरान भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक विवाद चरम पर थे। 2023 में निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की कथित संलिप्तता के ट्रूडो के आरोपों को भारत ने बेतुका बताकर खारिज किया था। उस दौर में दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित किया। व्यापार वार्ताएँ ठप्प हुईं। वीज़ा प्रािढयाओं पर खराब असर पड़ा।

कार्नी की जीत: भारत-कनाडा रिश्तों में संतुलन की उम्मीद

कनाडा की खुफिया एजेंसी सीएसआईएस के, 2025 के चुनावों में भारत के संभावित हस्तक्षेप के दावों ने हालात को और पेचीदा बनाया। इन तनावों ने न केवल द्विपक्षीय रिश्तों को नुकसान पहुँचाया, बल्कि कनाडा में पढ़ने वाले 4,27,000 भारतीय छात्रों और वहाँ बसे भारतीय प्रवासियों की मुसीबतें बढ़ाईं।ऐसे में, मार्क कार्नी के उदय को बड़ी हद तक सकारात्मक बदलाव का संकेत माना जा सकता है।

उनकी लिबरल पार्टी ने 343 सीटों में से 168 सीटें जीती हैं, जो बहुमत से कुछ कम हैं। लेकिन गठबंधन सरकार के नेतृत्व में वे स्थिरता प्रदान कर सकते हैं। ग़ौरतलब है कि पूर्व बैंकर और कनाडा व ब्रिटेन के केंद्रीय बैंकों के गवर्नर रहे कार्नी ने चुनाव प्रचार में भारत के साथ रिश्ते सुधारने को प्राथमिकता देने की बात कही थी। वे भारत के साथ कनाडा के आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों की अहमियत समझते हैं। उनकी यह सोच खालिस्तानी समर्थकों के प्रति ट्रूडो के नरम रुख से भिन्न है।

कार्नी की यह जीत कनाडा में खालिस्तानी आंदोलन की राजनीतिक पकड़ के कमज़ोर पड़ने का सूचक है। न्यू डेपोटिक पार्टी (एनडीपी) के नेता जगमीत सिंह की हार और उनकी पार्टी की कमजोर स्थिति ने खालिस्तानी तत्वों को झटका दिया है। याद रहे कि सिंह को ट्रूडो सरकार में भारत-विरोधी रुख का समर्थक माना जाता था। कार्नी की सरकार के तहत कनाडा संभवत इस मुद्दे पर संतुलित नीति अपनाएगा। ऐसा हुआ तो भारत की क्षेत्रीय अखंडता को खालिस्तान समर्थकों की चुनौती कमज़ोर होगी।

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भारत-कनाडा रिश्तों की पुनर्बहाली और रचनात्मक कूटनीति

कहा जा सकता है कि भारत के लिए यह कूटनीतिक संवाद को पुन आरंभ करने का सही वक़्त है। विदेश मंत्रालय ने मार्च 2025 में कहा भी तो था कि भारत कनाडा के साथ रिश्ते सुधारने को तैयार है। अत दोनों देशों को उच्चायुक्तों की नियुक्ति और व्यापार वार्ताओं को पुन शुरू करने पर ध्यान देना चाहिए। कनाडा में 600 से अधिक कनाडाई कंपनियाँ और भारत में कनाडाई निवेश (3.3 अरब डॉलर) द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों की मज़बूती को दर्शाते हैं।

व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप देना दोनों देशों के हित में होगा। लेकिन शायद यह सब ठीक होना बहुत आसान नहीं है। कनाडा की जी-7 सदस्यता और फाइव आईज़ गठबंधन में उसकी पश्चिमी सहयोगियों के साथ नज़दीकी भारत के लिए जटिलताएँ पैदा कर सकती है। यों, भारत को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए रचनात्मक कूटनीति पर ज़ोर देना होगा। जी-20 जैसे मंचों पर दोनों देशों को आपसी विश्वास बहाली के लिए काम करना चाहिए।

निष्कर्षत, कार्नी की जीत भारत-कनाडा रिश्तों में नई शुरूआत का मौका तो ज़रूर है। बशर्ते कि दोनों देश अतीत के तनावों से ऊपर उठकर लोकतंत्र, बहुलवाद और साझा आर्थिक हितों पर आधारित रिश्तों को मजबूत करना चाहें। इससे न केवल द्विपक्षीय रिश्ते पुन स्थापित हो सकेंगे, बल्कि वैश्विक मंच पर दोनों देशों की स्थिति को भी सुदृढ़ता मिलेगी। वैसे फिलहाल कनाडा को सबसे पहले तो डोनल्ड ट्रंप के टैरिफ वार से बचना है!

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