सीसीएमबी में पूर्वी घाट की जैव विविधता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
हैदराबाद, सीएसआईआर-सीसीएमबी के लाकोन्स परिसर में पूर्वी घाट की पहचान : जीन से भू-दृश्य तक विषयक चार दिवसीय कार्यशाला और संगोष्ठी आयोजित की गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्वी घाट की जैव विविधता की वैज्ञानिक समझ को गहरा करते हुए संरक्षण की ठोस रूपरेखा तैयार करना था। अवसर पर विशेषज्ञों ने कहा कि प्रभावी संरक्षण के लिए जीन स्तर से लेकर संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और भू-दृश्य स्तर तक की सूचनाओं जैसे भूमि उपयोग, आवास की निरंतरता, स्थलाकृति और उपग्रह आधारित मानचित्र का समन्वय आवश्यक है।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, पूर्वी घाट भारत की जटिल और कम अध्ययनित पर्वत श्रेणियों में से एक है। यह देश के पूर्वी भाग में टूटी-फूटी पहाड़ियों के रूप में फैला हुआ है। यह क्रमश पश्चिमी घाट तथा पूर्वी भारत के वनों से जुड़ता है। इसकी उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन है। इसका पारिस्थितिक इतिहास पश्चिमी घाट से भिन्न रहा है। यहाँ की जैव-विविधता का बड़ा भाग अब भी पूर्ण रूप से दर्ज नहीं किया गया है। इसके साथ ही यह क्षेत्र आवास विनाश, खंडन तथा जलवायु परिवर्तन के कारण निरंतर संकट में है। संगोष्ठी ने इसके जैव भौगोलिक स्वरूप, पारिस्थितिक प्रक्रियाओं और संरक्षण प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया।
जानकारी देते हुए बताया गया कि लाकोन्स-सीसीएमबी के वैज्ञानिकों ने पर्यावरणीय डीएनए पद्धति के माध्यम से पूर्वी घाट की जैव-विविधता का आकलन किया। पारंपरिक नमूना-आधारित जांच के स्थान पर यह विधि उन सूक्ष्म आनुवंशिक अंशों का अध्ययन करती है, जिन्हें जीव अपने आसपास के वातावरण में छोड़ते हैं। इसके माध्यम से कीट, जलचर, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी, वनस्पतियों तथा सूक्ष्म जीवों सहित अनेक प्रजातियों की उपस्थिति का पता चला। इनमें कई पहले दर्ज नहीं थीं।
जीन से भू-दृश्य तक समन्वित संरक्षण जरूरी
विशेषज्ञों ने कहा कि प्रभावी संरक्षण के लिए जीन स्तर से लेकर संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और भू-दृश्य स्तर तक की सूचनाओं जैसे भूमि उपयोग, आवास की निरंतरता, स्थलाकृति और उपग्रह आधारित मानचित्र का समन्वय आवश्यक है। इससे संवेदनशील प्रजातियों की पहचान तथा विविधता का पता लगाने के साथ-साथ जलवायु अनुकूल संरक्षण रणनीतियां बनाने में सहायता मिलेगी।
आयोजकों ने इस संदर्भ में कहा कि पूर्वी घाट की अल्प-अध्ययित जैव विविधता के संरक्षण के लिए ऐसे वैज्ञानिक समुदाय की आवश्यकता है, जो क्षेत्रीय अध्ययन के साथ-साथ आनुवंशिक आंकड़ों को समझने और उपयोग करने में सक्षम हो। यह पहल वैज्ञानिक दृष्टि से सुदृढ़ और व्यावहारिक संरक्षण उपायों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। संगोष्ठी के अंतर्गत जीनोमिक अध्ययन पर गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण भी आयोजित किया गया। इसमें प्रतिभागियों को आनुवंशिक आंकड़ों की प्रक्रिया, जीनोम संयोजन, सांख्यिकीय विश्लेषण, टिप्पणांकन, चित्रात्मक प्रस्तुति और जैविक अर्थ निकालने की विधियों से परिचित कराया गया।
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चार दिवसीय कार्यक्रम में देश के विभिन्न शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों ने भाग लेकर मीठे जल की पारिस्थितिकी, वन एवं घास भूमि संबंध, परागण जीवविज्ञान, पशु व्यवहार, दूरसंवेदी तकनीक, प्राचीन आनुवंशिक अध्ययन, वर्गीकरण तथा संरक्षण आनुवंशिकी आदि विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में स्नातकोत्तर छात्रों, शोधार्थियों, शिक्षकों, वन अधिकारियों तथा स्वैच्छिक संगठनों के प्रतिनिधियों सहित लगभग सत्तर प्रतिभागियों ने भाग लिया।
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