नाटो का मलाल : सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला!
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का भाषण ऐसा था जैसे कोई बूढ़ा जादूगर स्टेज पर आया हो और अपने पुराने खेलों से दर्शकों को चकित करने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन इस बार, जादू के बजाय झूठ की बौछार थी। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को बर्फ का टुकड़ा बताते हुए दावा किया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने इसे डेनमार्क को वापस दिया! लगता है उनकी अक्ल घास चरने गई थी!
बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स और पोलिटिफैक्ट जैसे तथ्य-खोजियों ने तुरंत खुलासा कर दिया कि अमेरिका ने ग्रीनलैंड को कभी लिया ही नहीं था; सिर्फ युद्ध के दौरान उसकी रक्षा की थी। ट्रंप ने इसे छोटी सी माँग बताया। लेकिन वास्तव में यह एक बड़ा झूठ था, जो आर्कटिक की रणनीति से ज्यादा उनके अहंकार की उपज लगता है। और हाँ, भाषण में उन्होंने ग्रीनलैंड और आइसलैंड को कई बार कन्फ्यूज किया। शायद क्योंकि दोनों में लैंड है, या शायद क्योंकि सच्चाई उनके लिए वैसी ही फिसलन भरी है जैसे बर्फ! अचरज नहीं अगर इस फिसलन के पीछे उनका बुढ़ापा और बीमारी जैसी वजहें हों!
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अर्थव्यवस्था के ‘चमत्कार’ पर अतिरंजना से झूठ तक की परेड
इस मौके पर ट्रंप ने नाटो की खूब लानत-मलामत की। बोले कि अमेरिका को इससे कुछ नहीं मिलता, सिर्फ यूरोप की रक्षा करता है। लेकिन दुनिया इस सच से वाकिफ है कि 9/11 के बाद नाटो ने अमेरिका की मदद की और यह गठबंधन अमेरिका के लिए सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक लिहाज से फायदेमंद रहा है। इसीलिए दूसरे की तथ्य-परीक्षकों ने ट्रंप के इन दावों को झूठ की बमबारी तक कह दिया है।
अर्थव्यवस्था पर ट्रंप ने खुद को चमत्कार का इंजन बताया – सबसे तेज टर्नअराउंड, कोई महँगाई नहीं, गैसोलिन 2 डॉलर से नीचे। गार्डियन और टाइम ने इसे अतिरंजना से झूठ तक की परेड बताया। महाचौधरी की दबंगई के आगे फोरम के सदस्य भले ही सदाशयतावश मुँह फेरकर हँसे हों, लेकिन सोशल मीडिया ने तो कलई खोल ही डाली- ट्रंप फिर झूठ बोल रहे हैं! सब तरफ मानो एक ही धुन तैर रही हो- सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला!
दरअसल, ट्रंप महोदय आदतन झूठे हैं। उनके झूठ बोलने के मनोविज्ञान को समझने की ज़रूरत है। मनोवैज्ञानिक इसे सॉलिप्सिस्टिक रियलिटी (आत्मवादी यथार्थ) कहते हैं। यानी, ट्रंप की दुनिया में सच्चाई वही है जो उनके अहंकार को पोषित करे! वे हमेशा झूठ को अतिरंजना से सजाकर परोसने में माहिर हैं। लेकिन यह सिर्फ रणनीति नहीं; यह आत्ममुग्धता (नार्सिसिज्म) का चरम है। कहना गलत न होगा कि ट्रंप इस इल्यूजरी ट्रूथ इफेक्ट के मास्टर हैं कि झूठ को बार-बार दोहराओ, तो वह सत्य लगने लगता है। 2020 के चुनाव के ज़माने से ही वे बड़ी बेशर्मी से यही करते आ रहे हैं।
झूठ का साम्राज्य और तालियाँ बजाते समर्थकों की जमात
वे इस तरह अपनी हर हार को भी जीत की तरह पेश करते हैं। यही नहीं, झूठ उनके लिए डूपिंग डिलाइट है। यानी, झूठ बोलकर उन्हें खुशी मिलती है, क्योंकि यह शक्ति का अहसास देता है। वे झूठ से साम्राज्य बनाते हैं और अपनी हर असंगत बात को न्यायोचित मनवाना चाहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि उनके इर्द-गिर्द भी उनके जैसे ही समर्थक जुट गए हैं, जो उनकी हर सनक पर तालियाँ पीटते हैं। कोई आईना दिखाने की कोशिश करे तो ट्रंप उसे ठोकर मारने में एक पल नहीं लगाते; यह तो दूसरी पारी के इस एक साल में जगज़ाहिर हो ही चुका है!
कहना न होगा कि ट्रंप का यह झूठ बोलना सिर्फ हास्यास्पद नहीं, ख़तरनाक है। यह राजनीतिक विमर्श को उलट देता है – झूठ सामान्य हो जाता है, और समर्थक खुद झूठ बोलने लगते हैं! ऑपेरशन सिंदूर और भारत-पाक युद्ध विराम को लेकर भी तो वे सैकड़ों बार झूठ बोलकर भारत को दुविधा में डालते रहे हैं न? लेकिन दावोस में एक बात साफ हुई कि ट्रंप का जादू अब फीका पड़ रहा है! तथ्य-परीक्षकों की सेना तैयार थी और सच्चाई, चुटकी बजाते, बर्फ की तरह पिघलकर सामने आ गई। क्या ट्रंप कभी सुधरेंगे? शायद नहीं; क्योंकि उनके लिए झूठ ही आत्ममुग्धता का सबसे अच्छा साथी है!
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