उत्तर-दक्षिण शिव से और पूरब पश्चिम विष्णु से…

तटवर्ती आंध्रप्रदेश में ऐसे पांच मंदिर हैं, जिनका संबंध तारकासुर से है। तारकासुर का वध कार्तिकेय ने किया था। तारकासुर शिव-भक्त था। इसलिए उसके सिर के भाग जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शिव मंदिर स्थापित किए गए। इन मंदिरों को पंचराम क्षेत्र कहा जाता है। तमिलनाडु में पलनी के पहाड़ स्थित हैं। जब कार्तिकेय गु-स्से सेने में कैलाश पर्वत छोड़कर दक्षिण भारत गए, तब पार्वती नहीं चाहती थीं कि उन्हें अपने घर की याद आए।

इसलिए जब अगस्त्य ऋषि दक्षिण भारत के लिए निकले, तब पार्वती के कहने पर वे अपने साथ हिमालय के कुछ पहाड़ भी ले गए। हिडिंबा नामक असुर उन पहाड़ों को कांवड़ के सहारे अपने कंधों पर उठाकर ले गया था। रास्ते में पहाड़ इतने भारी हो गए थे कि हिडिंबा को उन्हें धरती पर रखना पड़ा। उसने पाया कि पहाड़ उस पर बैठे एक बालक के कारण भारी हो गया था। वह जान गया कि बालक स्वयं कार्तिकेय थे। जिस स्थान पर पहाड़ नीचे रखे गए, वहां आज पलनी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।

रावणानुग्रह मूर्ति में शिव की लीला का दर्शन

इन पहाड़ों को दक्षिण भारत का हिमालय माना जाता है। कहते हैं कि एक बार रावण कैलाश पर्वत को उठाकर लंका ले जाना चाहता था, लेकिन इससे पहले वह उसे उठा पाता, शिव ने उसे कैलाश पर्वत के नीचे दबा दिया। यह घटना मंदिरों में रावणानुग्रह मूर्ति के माध्यम से दिखाई जाती है। एक अन्य अवसर पर, जब रावण शिवलिंग को दक्षिण ले जा रहा था, तब गणेशजी ने उसे कर्नाटक के समुद्रतट पर गोकर्ण के पास शिवलिंग नीचे रखने के लिए विवश कर दिया।

एक बार जब विभीषण विष्णु की प्रतिमा को दक्षिण ले जा रहे थे, तब उन्हें भी वह प्रतिमा कावेरी नदी के पास रखने के लिए विवश किया गया। इस क्षेत्र में विष्णु को रंगनाथ के रूप में पूजा जाता है। दक्खन के पठार के पत्थरों के साथ भी एक रोचक कथा जुड़ी है। हनुमान के नेतृत्व में वानर सेना ने रामसेतु का निर्माण किया था। कहा जाता है कि सेतु के निर्माण के बाद वानरों ने अपने हाथों में लिए पत्थर वहीं रख दिए, जिन्हें आज हम दक्खन के पठार में पाते हैं।

वामन, कृष्ण और उत्तर-पूर्व भारत से जुड़ी दंत-कथाएं

भारत का पश्चिमी समुद्रतट परशुराम से जुड़ा है। मान्यता है कि स्वार्थी राजाओं का वध करने के पश्चात परशुराम नर्मदा क्षेत्र से पश्चिमी समुद्रतट की ओर गए। जब उन्होंने अपनी रक्तरंजित कुल्हाड़ी समुद्र में फेंकी, तब समुद्र घृणा से पीछे हट गया और कोंकण तथा मालाबार समुद्रतट का निर्माण हुआ। पश्चिमी समुद्रतट की स्थान बाली से भी जुड़ी हैं, जिनका विष्णु के वामन अवतार ने वध किया था। उत्तर-पूर्व भारत में वराह और भू-देवी के पुत्र नरक भौम का राज्य था, जिसे कृष्ण ने पराजित किया था। कृष्ण ने बाणासुर को पराजित किया था, जो असम के सोनितपुर में राज करता था।

इस क्षेत्र की दंत-कथाओं के अनुसार कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी और उनकी बहू ऊषा ब्रह्मपुत्र क्षेत्र की निवासी थीं। राम की दक्षिणी यात्रा के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दक्षिण भारत की देवियां, जैसे मदुरै की मीनाक्षी देवी भी शिव से विवाह करने उत्तर भारत आई थीं। उन्हें और शिव के सुंदरेश्वर रूप को मदुरै के मीनाक्षी-सुंदरेश्वर मंदिर में पूजा जाता है। तमिलनाडु के ही चिदंबरम में शिव को नृत्य के देवता अर्थात नटराज के रूप में पूजा जाता है।

राम और कृष्ण की यात्राएं और तीर्थ परंपराओं की उत्पत्ति

भारत में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां शिव स्वयं अग्नि के अंतहीन स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। इन्हें ज्योतिर्लिंग कहा जाता है और वहां शिव की पूजा की जाती है। ये ज्योतिर्लिंग केवल हिमालय में नहीं, बल्कि दक्खन में भी पाए जाते हैं। जहां उत्तर और दक्षिण भारत शिव के माध्यम से जुड़े हैं, वहीं विष्णु के कारण पूर्व और पश्चिम भारत आपस में जुड़े हैं। विष्णु को उत्तराखंड के बद्रीनाथ में, ओडिशा के पुरी में, तमिलनाडु के रामेश्वरम में और गुजरात के द्वारका में पूजा जाता है।

विष्णु ने राम के रूप में उत्तर से दक्षिण तक यात्रा की। दूसरी ओर, वे कृष्ण के रूप में मथुरा से गुजरात के तट पर द्वारका तक गए। पुराणों के अनुसार, यमुना नदी ने भी उनका साथ दिया। इस प्रकार प्राचीन काल के प्रवासों की स्मृतियां भारत के तीर्थ स्थलों में समाई हुई हैं। ये कथाएं वेदों में नहीं, बल्कि पुराणों में मिलती हैं। इनका पहला उल्लेख लगभग 2000 वर्ष पहले हुआ और 1000 वर्ष पहले तक, जैसे वैदिक संस्कृति गंगा के मैदानों से पूरे भारत में फैली, वैसे ही ये कथाएं भी पूरे देश में फैलती चली गईं।

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