निशाने पर परमाणु ठिकाने!

ईरान-इजराइल युद्ध में जिस तरह परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। गौरतलब है कि इधर के वर्षों में विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे सैन्य संघर्षों ने इस चिंताजनक प्रवृत्ति को जन्म दिया है। शत्रु देशों की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने की रणनीति! यह प्रवृत्ति न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है, बल्कि वैश्विक शांति और मानवता के लिए भी गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत करती है।

परमाणु शक्ति संपन्न होने के साथ-साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति पर चलने वाले भारत के लिए इस स्थिति का विश्लेषण करके इसके बहुआयामी खतरों को समझना बेहद ज़रूरी है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रॉसी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को चेतावनी दी है कि ऐसी सैन्य कार्रवाइयाँ न केवल परमाणु सुरक्षा और संरक्षा को खतरे में डालती हैं, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए भी गंभीर परिणाम ला सकती हैं।

परमाणु युद्ध की आशंका और उसके विनाशकारी प्रभाव

ये हमले संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, जिससे वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था कमजोर होती है। भारत-पाकिस्तान संदर्भ में भी यह मुद्दा प्रासंगिक है। दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं और हाल के तनाव (पहलगाम आतंकी हमले के बाद, ऑपरेशन सिंदूर) ने परमाणु युद्ध की आशंकाओं को बढ़ाया है। पाकिस्तान की फुल स्पेक्ट्रम डिटरेंस नीति और टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का विकास भारत के लिए चिंता का विषय है, जबकि भारत की नो फर्स्ट यूज नीति जवाबी हमले में पूर्ण शक्ति के उपयोग पर जोर देती है।

परमाणु सुविधाओं पर हमला दोनों देशों के बीच सीमित युद्ध को पूर्ण परमाणु युद्ध में बदल सकता है, जिसके परिणाम दक्षिण एशिया के दो अरब लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी होंगे। परमाणु सुविधाओं पर हमलों के खतरे बहुआयामी हैं। पहला है रेडियोलॉजिकल जोखिम। इन हमलों से रेडियोधर्मी पदार्थों का रिसाव हो सकता है, जो पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और खाद्य आपूर्ति को दीर्घकालिक नुकसान पहुँचा सकता है।

दूसरा है भू-राजनीतिक अस्थिरता का खतरा। ऐसी कार्रवाइयाँ वैश्विक शक्तियों (जैसे अमेरिका, रूस और चीन) को संघर्ष में खींच सकती हैं, जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बढ़ सकती है। तीसरा है आर्थिक जोखिम। परमाणु युद्ध या रिसाव से वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और वित्तीय बाजार प्रभावित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, ईरान-इजराइल तनाव के दौरान तेल की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है।

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भारत की भूमिका और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से जटिल है। एक ओर, हमें अपनी परमाणु सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी है, वहीं दूसरी ओर, क्षेत्रीय और वैश्विक शांति को बढ़ावा देना है। भारत की परमाणु नीति, जो शांतिकाल और युद्धकाल दोनों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश देती है, इस संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है। साथ ही, भारत को कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय रहना होगा, ताकि परमाणु अप्रसार और सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जा सके।

वैश्विक समुदाय को इस खतरे से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। आईएईए जैसे संगठनों को परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा के लिए सख्त दिशानिर्देश लागू करने चाहिए। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र को परमाणु हमलों को रोकने के लिए प्रभावी मध्यस्थता और प्रतिबंधों की व्यवस्था करनी चाहिए। भारत जैसे जिम्मेदार परमाणु शक्ति संपन्न देश को इस दिशा में नेतृत्व करना चाहिए, ताकि मानवता को इस विनाशकारी खतरे से बचाया जा सके।

निष्कर्षत, परमाणु सुविधाओं पर हमले की प्रवृत्ति वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह समय है कि विश्व समुदाय एकजुट होकर इस खतरे का सामना करे और शांति, सहयोग और संवाद के मार्ग को अपनाए। भारत, अपनी परमाणु नीति और कूटनीतिक शक्ति के साथ, इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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