तेल युद्ध : फूलदान टूट चुका, नुकसान हो चुका !

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हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल ने वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को लेकर एक ऐसी चेतावनी दी है, जो केवल आर्थिक आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि मनुष्यता के भविष्य की बदलती दिशा का संकेत है। उनका कहना है कि ईरान युद्ध के कारण उपजे तेल संकट ने जीवाश्म ईंधन उद्योग की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया है। उन्होंने एक बहुत ही मर्मस्पर्शी रूपक का उपयोग करते हुए कहा है कि फूलदान अब टूट चुका है और नुकसान हो चुका है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भरोसा टूटने से जो दरार पड़ गई है, उसे अब पुराने तरीकों से नहीं भरा जा सकता। दुनिया अब कभी भी ऊर्जा के पुराने ढर्रे पर वापस नहीं लौटेगी।

यहाँ जीवाश्म ईंधन को समझना जरूरी है। सरल शब्दों में कहें तो यह वह ईंधन है जो करोड़ों वर्षों तक जमीन के नीचे दबे पौधों और जीवों के अवशेषों से बनता है, जैसे कि कोयला, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस। दुनिया दशकों से अपनी प्रगति के लिए इसी पर निर्भर रही है। लेकिन वर्तमान संकट ने यह साबित कर दिया है कि यह निर्भरता अब एक बड़ा जोखिम बन चुकी है।

ऊर्जा सुरक्षा पर युद्ध और तनाव का बढ़ता खतरा

जब हम ऊर्जा सुरक्षा की बात करते हैं, तो इसका अर्थ होता है – किसी भी देश के लिए ऊर्जा की बाधारहित और किफायती दरों पर निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना। युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों ने इस सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। यों अब देशों का भरोसा इन पारंपरिक ईंधनों से उठने लगा है। सयाने कह रहे हैं कि यह संकट अब केवल कीमतों के बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह एक गहरे नीतिगत बदलाव की ओर इशारा कर रहा है।

जो देश आज भी तेल और गैस के नए भंडारों की खोज में लगे हैं, वे दरअसल एक ऐसे रास्ते पर चल रहे हैं जिसका अंत करीब है! इसीलिए बिरोल ने ब्रिटेन को उत्तरी सागर में नए तेल क्षेत्रों की खुदाई न करने की सलाह दी है। उनका तर्क है कि नई खुदाई से न तो आम आदमी के बिजली के बिल कम होंगे और न ही देश अधिक सुरक्षित होगा। दरअसल, वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से तय होती हैं, न कि घरेलू उत्पादन से।

जगजाहिर है कि इन हालात में अब दुनिया का झुकाव नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। नवीकरणीय ऊर्जा का अर्थ है – ऊर्जा के वे स्रोत जो प्राकृतिक रूप से स्वतः ही पुनर्जीवित होते रहते हैं और कभी समाप्त नहीं होते, जैसे कि सूर्य की रोशनी (सौर ऊर्जा) और हवा (पवन ऊर्जा)। इसके साथ ही विद्युतीकरण यानी ऊर्जा की जरूरतों के लिए पेट्रोल या गैस के बजाय बिजली के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। फातिह बिरोल के अनुसार, अब जीवाश्म ईंधन से दूरी केवल पर्यावरण को बचाने के लिए ही नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य शर्त बन गई है।

भारत की ऊर्जा जरूरतों में आयात पर भारी निर्भरता

यहाँ जरा ठहरकर भारत के बारे में भी बात कर लें। हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था पर वैश्विक तेल की कीमतों का सीधा असर पड़ता है। यदि हम नेट जीरो की ओर बढ़ते हैं, तो इसका अर्थ होगा- एक ऐसी स्थिति पैदा करना जहाँ हम जितनी कार्बन गैसें वातावरण में छोड़ रहे हैं, उतनी ही तकनीक या जंगलों के माध्यम से वापस सोख ली जाएँ, ताकि पर्यावरण पर हमारा प्रभाव शून्य हो जाए। बिरोल के विचार इस दिशा में भारत के प्रयासों को वैश्विक संदर्भ में और भी प्रासंगिक बना देते हैं।

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किस्सा-कोताह यह कि ऊर्जा का पुराना तंत्र अब बिखर चुका है। हम ऐसे संक्रमण काल में हैं जहाँ भविष्य की मजबूती स्वदेशी और स्वच्छ ऊर्जा में ही निहित है। हमें ऐसी ऊर्जा प्रणाली विकसित करनी होगी, जो न केवल सस्ती और सुलभ हो, बल्कि अंतरराष्ट्रीय तनावों और युद्धों के झटकों से भी पूरी तरह सुरक्षित हो। यानी, भविष्य अब ज़मीन के नीचे छिपे काले तेल में नहीं, खुले आसमान की धूप और बहती हवाओं में है।

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