मछली, मुड़ी और मतों की भूख

आज के दौर में अगर आप पश्चिम बंगाल की गलियों में निकलें, तो आपको हवा में दो तरह की गंध महसूस होगी। एक: सरसों के तेल में तली जा रही ताज़ा इलिश मछली की सोंधी खुशबू। और दूसरी: सत्ता की वह तीखी झाल, जो चुनावी कड़ाही में पिछले कई महीनों से सिंक-भुन रही है। बंगाल के इस महा-संग्राम में विचारधाराओं की धूल तो जाने कब की बैठ चुकी है। उसकी जगह ले ली है थाली की राजनीति ने।
अजीब विडंबना है! कभी बंगाल भद्रलोक, मार्क्सवाद और रवींद्र नाथ ठाकुर के कालजयी गीतों या नज़रुल इस्लाम की क्रांतिकारी कविताओं के लिए जाना जाता था, लेकिन 2026 के इस चुनाव ने साबित कर दिया है कि सत्ता का रास्ता दिल से नहीं, बल्कि सीधे पेट से होकर गुज़रता है। अब राजनैतिक दलों के घोषणापत्र कम और किसी रेस्तरां के मेन्यू कार्ड ज़्यादा नज़र आते हैं। एक तरफ वे हैं जो माछ-भात को अपनी अस्मिता का सुरक्षा कवच बनाए हुए हैं, तो दूसरी तरफ वे कथित बाहरी जो अचानक झालमुड़ी के इतने बड़े शौकीन हो गए हैं कि लगता है मानो उनका बचपन हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्म पर मुड़ी फांकते ही बीता हो!
नेताओं का आम आदमी जैसा दिखने का नया अंदाज़
सियासत का ज़ाय़का देखिए। बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता, जो आमतौर पर दिल्ली की वातानुकूलित गलियों में प्रोटीन शेक या संतुलित आहार लेते हैं, अचानक बंगाल की चिलचिलाती धूप में किसी पटरीवाले के पास रुककर झालमुड़ी का लुत्फ लेते पाए जाते हैं। कैमरा एंगल ऐसा कि मुड़ी का हर दाना और उसमें पड़ा हुआ कच्चा सरसों का तेल तक साफ दिखे! यह झालमुड़ी महज़ एक नाश्ता नहीं, एक संदेश है: देखो, मैं भी तुम्हारी तरह आम हूँ, भले ही मुझे यह न पता हो कि मुड़ी में नारियल का टुकड़ा डालना अनिवार्य है या ऐच्छिक।
उधर, दूसरी पार्टी ने मछली को अपना ब्रह्मास्त्र बना लिया है। यहाँ मुकाबला अब विकास-दर या रोजगार के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि इस पर है कि किसकी थाली में मछली का टुकड़ा बड़ा है? और कौन मछली को काँटे सहित खाने का असली हुनर जानता है? एक पार्टी आरोप लगाती है कि शाकाहारी विचारधारा वाले लोग बंगाल की संस्कृति पर हमला कर रहे हैं, तो दूसरी पार्टी तुरंत पलटवार करते हुए किसी ढाबे पर बैठकर मछली-भात खाते हुए अपनी फोटो ट्वीट कर देती है।
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जनता विकास और भोजन की राजनीति के बीच उलझी
इस फूड-वार में जनता बेचारी असमंजस में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह वोट विकास को दे या कुकरी शो के जज की तरह पार्टियों की ईटिंग-हेबिट्स को। हद तो यह है कि जो नेता कल तक ममता और परिवर्तन की बात करते थे, वे अब बाँगड़ा और कतला मछली के बीच के अंतर पर शोध कर रहे हैं। राजनैतिक रैलियों में अब नारों से ज़्यादा आवाज़ें बोनलेस और फ्राई की सुनाई देने लगी हैं।
दरअसल, यह सब एक सोची-समझी थाली-नीति है। जब आप बुनियादी मुद्दों – जैसे उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य – पर बात करने से कतराते हैं, तो आप जनता को भोजन की मेज पर उलझा देते हैं। मछली का काँटा गले में फंस जाए तो इंसान बोल नहीं पाता। राजनैतिक दल भी यही तो चाहते हैं न कि मतदाता स्वाद में इतना उलझ जाए कि सवाल पूछना ही भूल जाए! यही वजह है कि झालमुड़ी में पड़ा नमक और मछली का तीखापन अब चुनाव आयोग की आचार संहिता से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
कोई रसगुल्ले की मिठास दिखाकर वोट माँग रहा है, तो कोई संदेश के बहाने अपना राजनैतिक संदेश भेज रहा है।
अतः मतदाताओं को चाहिए कि न तो किसी को झालमुड़ी खाते देख भावुक हों और न ही मछली तलते देख फिसल-फिसल जाएँ। सरकार किसी की भी बने, मैनीफेस्टो से चलनी चाहिए, मेन्यू कार्ड से नहीं!
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