ऑपरेशन सिंदूर : सीडीएस के साक्षात्कार के आईने में
तरह-तरह के दावों-प्रतिदावों के बीच, भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने, सिंगापुर में शांग्री-ला डायलॉग के दौरान बीबीसी को दिए साक्षात्कार में, ऑपरेशन सिंदूर के सैन्य और रणनीतिक पहलुओं पर खुलकर बात की। इसने न केवल भारत की सैन्य ताकत को वैश्विक मंच पर उभारा, राष्ट्रीय राजनीति में श्रेय और आरोप की होड़ को भी हवा दी। अब इसमें तो कोई शक रह ही नहीं गया है कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की आक्रामक रणनीति और सामरिक लचीलेपन को प्रदर्शित किया।
लेकिन यह देखना कष्टकर हो सकता है कि इसकी सफलता पर सवाल उठाने और श्रेय लेने की राजनीतिक दौड़ ने एक बार फिर राष्ट्रीय हितों को गौण कर डाला है। क्या सचमुच राजनीति इतनी ही क्रूर चीज़ है? खैर छोड़िए राजनीति की मीमांसा। अभी बात जनरल चौहान के साक्षात्कार की। उन्होंने दोहराया कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया और 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया।
ऑपरेशन सिंदूर: युद्ध, सूचना और संयम की ताकत
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के इस दावे को सिरे से खारिज किया कि पाकिस्तान ने 4 राफेल सहित 6 भारतीय जेट मार गिराए! चौहान ने स्वीकार किया कि शुरूआती चरण में भारत को कुछ हवाई नुकसान हुआ, लेकिन इसे गिनने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत ने अपनी सामरिक गलतियों को तुरंत सुधारा और 7, 8 और 10 मई को घातक हवाई हमलों से पाकिस्तानी वायु ठिकानों को तबाह किया। यह न केवल भारत की सैन्य क्षमता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत अब युद्ध के मैदान में त्वरित सुधार और जवाबी कार्रवाई में सक्षम है।
कहना न होगा कि सैन्य दृष्टि से, ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की मल्टी-डोमेन युद्ध क्षमता को उजागर किया। जनरल चौहान ने साइबर हमलों और गलत सूचनाओं के खिलाफ सेना की तैयारी पर जोर देते हुए कहा कि 15 प्रतिशत समय फर्जी खबरों का मुकाबला करने में खर्च हुआ। यह आधुनिक युद्ध की जटिलताओं को दर्शाता है, जहाँ सूचना युद्ध उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पारंपरिक युद्ध।
साथ ही, उन्होंने परमाणु युद्ध की आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच संचार लाइनें हमेशा खुली रहीं, जिसने स्थिति को नियंत्रित रखा। इससे भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और संयम का पता चलता है। खेद की बात यह है कि भारत की गौरवपूर्ण सैन्य सफलता की चमक को राष्ट्रीय राजनीति में श्रेय और आरोप की होड़ कमजोर करती दिखाई पड़ रही है।
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ऑपरेशन सिंदूर पर सियासत या राष्ट्रहित?
सत्तारूढ़ भाजपा ने ऑपरेशन की सफलता को भारत की नई आक्रामक नीति का प्रतीक बताया, जबकि विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने सरकार पर सवाल उठाए। कांग्रेस अध्यक्ष इस साक्षात्कार के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग करते दिखाई दिए – इस दावे के साथ कि सरकार ने देश को गुमराह किया है। उन्होंने बौराये फिरते अमेरिकी राष्ट्रपति के युद्धविराम दावों को शिमला समझौते का अपमान करार दिया। ऐसे वक़्त जबकि देश को एकजुट होकर सैन्य बलों का समर्थन करना चाहिए, ये यह बयानबाजियाँ आम नागरिक को कुछ ख़ास जँचती नहीं।
विपक्ष का यह रवैया न केवल सेना के मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को भी धूमिल करता है। सयाने ध्यान दिला रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया कहीं न कहीं पाकिस्तान के पक्ष में नैरेटिव गढ़ने में भी लिप्त दिख रहा है। ऐसे में, विपक्ष को अपनी आलोचना को रचनात्मक बनाना होगा, न कि केवल सत्ता के खिलाफ हमले का औजार।
ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की सामरिक ताकत और कूटनीतिक कौशल को विश्व पटल पर स्थापित किया। जनरल चौहान का साक्षात्कार इस बात का प्रमाण है कि भारत अब न केवल युद्ध के मैदान में, बल्कि सूचना और कूटनीति के क्षेत्र में भी सक्षम है। राष्ट्रीय राजनीति को, ओछे विवाद में पड़े बिना, इस गौरव को अपनाना चाहिए। यह समय है कि देश एकजुट होकर अपनी सेना के पीछे खड़ा हो, न कि श्रेय-अपश्रेय के खेल में उलझे।
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