बेहद हंगामेदार होगा संसद का शीतकालीन सत्र

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ध्यान रहे कि अमेरिका व इंग्लैंड जैसे देशों में संसद के कार्य दिवस फिक्स हैं, हमारे यहां ऐसा नहीं है। हां, तीन मुख्य सत्र अवश्य होते हैं- बजट सत्र, मानसून सत्र व शीतकालीन सत्र। लेकिन उनके कार्य दिवसों को निरंतर कम किया जा रहा है। वर्तमान शीतकालीन सत्र मात्र 19 दिन का होगा। एक सांसद की मासिक आय 1.24 लाख रूपये बेसिक, संसदीय क्षेत्र भत्ता 70,000 रूपये, ऑफिस भत्ता 60,000 रूपये और जब संसद चल रहा हो तो 2,500 रूपये प्रतिदिन है। इसके अतिरिक्त घर, मेडिकल, यात्रा, कम्युनिकेशन, पेंशन आदि के भी लाभ हैं। लेकिन आप खुद सोचें कि वह काम कितना करते हैं और क्या करते हैं?

संसद का शीतकालीन सत्र आज यानी 1 दिसंबर से 19 दिसंबर 2025 तक चलेगा, जिसमें सरकार लगभग 10 महत्वपूर्ण विधेयक लाने की योजना बनाये हुए है, जिसमें चंडीगढ़ से संबंधित विधेयक शामिल नहीं होगा; क्योंकि भारी विरोध के चलते फ़िलहाल के लिए सरकार ने उसे पेश करने का इरादा छोड़ दिया है। इसके बावजूद अनुमान है कि संसद के इस सत्र में काफी हंगामा होने वाला है, विशेषकर इसलिए कि विपक्ष कुछ अति संवेदनशील व विवादित मुद्दे उठा सकता है।

बहरहाल, एक दिन राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम् पर चर्चा के लिए भी समर्पित रहेगा, जिसकी रचना के 150 वर्ष पूर्ण हुए हैं और संभवत सरकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के बांग्ला भाषा के उपन्यास आनंद मठ (1882) में शामिल इस गीत के सभी पद संसद में प्रस्तुत करेगी, जिसे बंकिमचन्द्र ने मूलत 1875 में रचा था। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कोई राजनीतिक दल या सांसद, संसद सत्रों की निरंतर घटती समय अवधि के मुद्दे को क्यों नहीं उठाता?

संसद सत्र घटे, वेतन बढ़े—कम काम पर उठ रहे गंभीर सवाल

एक मोटा अंदाज़ा यह है कि 1970 व 1980 के दशकों की तुलना में संसद सत्रों की समय अवधि में तीन गुना कमी आयी है, जबकि सांसदों के वेतनों व भत्तों में (अक्सर बिना चर्चा के) कई गुना वृद्धि हो चुकी है। मोटी तनख्वाह लेकर भी सांसद, संसद में इतना कम काम क्यों करने लगे हैं? संसद का शीतकालीन सत्र आरंभ होने से एक दिन पहले यानी रविवार (30 नवंबर 2025) को केंद्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलायी है, जिसमें संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजीजू ने दोनों सदनों में राजनीतिक दलों के फ्लोर लीडर्स से मुल़ाकात की यह सुनिश्चित करने के लिए कि सत्र के दौरान लोकसभा व राज्यसभा की कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके।

रिजीजू ने कहा है कि उन्होंने विपक्षी दलों से आग्रह किया है कि वे दोनों सदनों के कामकाज में पूर्णत हिस्सा लें और ज्वलंत संसदीय व्यवस्था बनाने में मदद व योगदान करें। लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा? मुश्किल लगता है। सरकार का इरादा शीतकालीन सत्र की शुरुआत पहले पूरे दिन वंदेमातरम् गीत पर चर्चा करने की है, जो सत्र के समापन पर संसद में गाया जाता है। सरकार का विचार यह है कि इस गीत को पूरा गाये जाने पर चर्चा की जाये। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आरोप है कि इस गीत के महत्वपूर्ण पदों को 1937 में हटा दिया गया था, जिसकी वजह से भारत का विभाजन हुआ।

वंदेमातरम् का केंद्रीय विचार भूमि को देवी माता के रूप में पूजने से संबंधित है। बंकिमचन्द्र ने अपने इस गीत को अपने बाद के उपन्यास आनंद मठ में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध क्रांति-नारे के रूप में प्रयोग किया था। दिलचस्प यह है कि राज्यसभा सचिवालय ने सांसदों को निर्देश दिया है कि वह सदन की गरिमा बनाये रखने के लिए वंदेमातरम् और जय हिन्द के नारे न लगाएं।

उद्धव ठाकरे का बीजेपी पर हमला, नारेबाज़ी को लेकर टकराव तेज

शिव सेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि उनके सांसद संसद में यह नारे लगायेंगे और अगर बीजेपी में हिम्मत है, तो उन्हें निलम्बित करके दिखाये। ठाकरे के अनुसार, बीजेपी का हिंदुत्व का मुखौटा बेनकाब हो चुका है। गौरतलब है कि जय हिन्द नारे की रचना चेम्पकरमण पिल्लै ने 1907 में की थी, जिसका अर्थ है हिंदुस्तान को जीत मिले और इसे ख्याति उस समय मिली जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का आधिकारिक नारा बना दिया और अपनी आईएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए 1940 के दशक में अपनाया।

दूसरी ओर विपक्ष एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन), वायु प्रदूषण आदि मुद्दों को मजबूती के साथ उठाने की योजना बना रहा है। ज्ञात रहे कि भारत का चुनाव आयोग फिलहाल 9 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर के तहत मतदाता सूचियों की पुनसमीक्षा कर रहा है। तृणमूल कांग्रेस एसआईआर का निरंतर विरोध करती आ रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस वोटबंदी घोषित करते हुए कहा है कि वह हर कीमत पर मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा करेंगी, चाहे एसआईआर का विरोध करते हुए उनकी गर्दन ही कलम क्यों न कर दी जाये।

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एसआईआर दबाव में बीएलओ की मौतों पर विपक्ष का तीखा सवाल

दो प्राइमरी स्कूल टीचर्स जो बूथ लेवल ऑफिसरों (बीएलओ) के रूप में क्रमशः पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद व गुजरात के मेहसाणा में कार्य कर रही थीं का 28 नवंबर 2025 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया; उनके परिजनों ने आरोप लगाया है कि एसआईआर-कार्य संबंधी दबाव के चलते ऐसा हुआ है। अब तक 6 राज्यों में लगभग दो दर्जन बीएलओ की मौतें आत्महत्या, दिल का दौरा पड़ने आदि से हो चुकी हैं, जिनमें कम समय में अधिक काम के बोझ को वजह बतायी गई है।

इस पृष्ठभूमि में तृणमूल के एक दस-सदस्यों वाले प्रतिनिधि मंडल ने 28 नवंबर 2025 को चुनाव आयोग के अधिकारियों में नई दिल्ली में मुलाकात की और मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाया कि उनके हाथ खून से सने हैं। समाजवादी पार्टी ने एसआईआर को बहुत बड़ा षड्यंत्र बताया है। तमिलनाडु की द्रमुक भी एसआईआर का विरोध कर रही है। एसआईआर का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

सरकार का कहना है कि वह शीतकालीन सत्र में हर विषय पर चर्चा करने के लिए तैयार है, जिनमें विस्तृत चुनाव सुधार तो शामिल हैं, लेकिन वह एसआईआर या चुनाव आयोग के किसी भी फैसले व प्रक्रिया पर चर्चा नहीं करेगी। विपक्ष एटॉमिक एनर्जी व भारतीय उच्च शिक्षा आयोग जैसे विधेयकों का भी विरोध कर रहा है, जो सरकार इस सत्र में पेश करने का इरादा रखती है और उसने प्रस्तावित चंडीगढ़ के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक पर भी सवाल खड़े किये हैं, जिसके बारे में सरकार ने संकेत दिये हैं कि फिलहाल वह उसे पेश नहीं करने जा रही है।

संसद की घटती कार्य अवधि पर बढ़ती चिंताएँ

अनुमान यह भी है कि विपक्ष बेरोज़गारी, दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण पर भी आक्रामक होने जा रहा है। इस स्थिति में यह अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि संसद का शीतकालीन सत्र हंगामी होने जा रहा है। बहरहाल, सरकार ने भी इस सत्र के लिए अपनी योजना को अंतिम रूप दे दिया है, जिसके लिए 26 नवंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के निवास पर बैठक हुई, जिसमें सभी वरिष्ठ मंत्रियों ने हिस्सा लिया था।

बहरहाल, सबसे बड़ी चिंता यह है कि संसद की कार्य अवधि में निरंतर कमी आती जा रही है। आज़ादी के बाद हमारी संसद हर साल लगभग 120 दिन काम करती थी, लेकिन 2002 व 2021 के बीच यह अवधि घटकर 67 दिन प्रति वर्ष औसत की रह गई। 17वीं लोकसभा के औसत वार्षिक कार्य दिवस तो मात्र 55 ही थे। ध्यान रहे कि अमेरिका व इंग्लैंड जैसे देशों में संसद के कार्य दिवस फिक्स हैं, हमारे यहां ऐसा नहीं है।

विजय कपूर
विजय कपूर

हां, तीन मुख्य सत्र अवश्य होते हैं- बजट सत्र, मानसून सत्र व शीतकालीन सत्र। लेकिन उनके कार्य दिवसों को निरंतर कम किया जा रहा है। वर्तमान शीतकालीन सत्र मात्र 19 दिन का होगा। एक सांसद की मासिक आय 1.24 लाख रूपये बेसिक, संसदीय क्षेत्र भत्ता 70,000 रूपये, ऑफिस भत्ता 60,000 रूपये और जब संसद चल रहा हो तो 2,500 रूपये प्रतिदिन है। इसके अतिरिक्त घर, मेडिकल, यात्रा, कम्युनिकेशन, पेंशन आदि के भी लाभ हैं। लेकिन आप खुद सोचें कि वह काम कितना करते हैं और क्या करते हैं?

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