साहित्य से मानवता के प्रचारक पवन कुमार मारुत (कवि कीर्ति))
शब्दों के इस घमासान में कविता के माध्यम से स्वयं को ढूँढ़ने का प्रयास करता हैं- कवि पवन कुमार ‘मारुत’। इस असमानता से भरी दुनिया में समता एवं सद्भावना के बीज बोना चाहते हैं। उनका मानना है कि साहित्य-रचना ही एकमात्र ऐसा पवित्र पथ है, जिस पर चलकर इंसान को इंसान बनाया जा सकता है और मानव का सिर्फ एक ही धर्म है- मानवता। वह मानवता की स्थापना के लिए साहित्य-रचना करते हुए, हिन्दी की सेवा में निरंतर लगे रहना चाहते हैं। मारुत राजकीय महाविद्यालय, कनवा में हिन्दी सहायक आचार्य हैं। यहाँ प्रस्तुत है, उनकी एक कविता।
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सौतन
(मनहरण कवित्त छन्द)
सपत्नी स्नेह संग सजाती सेज साजन की,
कड़वे कथनों की संगीन से सताती है।
सराबोर सितम सरोवर से स्वयं करे,
प्रति पल पीड़ा प्राण पातक लगाती है।
अकेलापन अजीब उतावली उदासी से,
सखी सौतन शोक समंदर सुलाती है।
नुकीले नश्तर समान शब्द-सेल सालते,
सौत वासर-विभावरी रोज़ रुलाती है।।

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