एक अंजान लड़की

एक अंजान लड़की
मेरे पास आती है
फिर मुझे सीने से लगाती है
संग मेरे बैठकर
खूबसूरत सपने सजाती है
कभी नन्हीं बच्ची की तरह
छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाती है
तो कभी माँ की तरह
तुरंत मान जाती है
यूँ तो वह मुझे बहुत चाहती है
मगर इजहार-ए-इश्क से घबराती है
जिससे वह मुझे बहुत तड़पाती है
दिन-रात स्नेह लुटाते अचानक वो मुझे
दोस्ती का दायरा समझाने लग जाती है
और हाँ दिनेश,
मुझे उसकी यही बात चुभने लग जाती है
जिससे मेरी नाराज़गी बढ़ जाती है
कभी प्रेम भाव को लेकर वो ख़ुद को ही
रोकने की असफल कोशिश करने लग जाती है
कभी-कभी तो आँखें मूँद कर
मेरा हाथ थामने की इच्छा जताती है
समाज का शोर सुन घबरा जाती है
उसकी यह उधेड़बुन मुझे बहुत सताती है
वो कभी मुझे सीने से लगाती है
तो कभी ख़ुद ही दूरी बढ़ाती है
उसकी इस उलझन भरी प्रतिक्रिया से
मेरी चाहत बेनामी-सी रह जाती है
वह फिर से मेरे जीवन की
एक अंजान लड़की बनकर रह जाती है!

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