तालिबान से व्यावहारिक रिश्ते : साहसिक क़दम या जोखिम ?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने तालिबान शासन से व्यावहारिक जुड़ाव की ज़रूरत जताई है। बेशक, भारत का यह बयान अफगानिस्तान के भविष्य को नई दिशा दे सकता है। इसका मतलब यह है कि मानवीय संकट को कम किया जाए और क्षेत्र में शांति स्थापित हो। याद रहे कि इसी बयान में भारत ने पाकिस्तान के हवाई हमलों में खोस्त, पक्तिका और कंधार प्रांतों में निर्दोष महिलाओं, बच्चों और क्रिकेटरों के मारे जाने की निंदा भी की है।

आइए, तनिक इस बयान की पृष्ठभूमि को समझें। 2021 में अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान सत्ता में आ गया। इस्लामी अमीरात की स्थापना हुई। महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन शुरू हो गया। भारत ने तब तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी। काबुल में दूतावास बंद कर दिया। तालिबान को आतंकवाद का साथी माना। लेकिन भारत को हकीकत के आगे मजबूर होना पड़ा।

अफगानिस्तान में भुखमरी, बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं ने 2.5 करोड़ लोगों को संकट में डाल दिया, तो भारत ने चुपचाप मदद भेजी। उसने 2 लाख टन गेहूँ और दवाइयाँ भेजने के अलावा सड़कें भी बनाईं। 2025 में यह जुड़ाव और बढ़ गया। जनवरी में विदेश सचिव विक्रम मिस्री की दुबई में तालिबान विदेश मंत्री से बात हुई। अक्तूबर में काबुल दूतावास फिर खुल गया। नवंबर में विदेश मंत्री एस.जयशंकर की यात्रा हुई। लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान की हरकतें बढ़ गईं।

मान्यता बिना जुड़ाव: भारत की व्यावहारिक अफगान कूटनीति

दिसंबर 2024 से हवाई हमले शुरू हो गए। टीटीपी के बहाने अफगान सीमा पर बमबारी की गई। अक्तूबर 2025 में काबुल विस्फोटों का इल्जाम तालिबान पर लगा। नवंबर में कंधार के स्पिन बोल्डक में पाँच अफगान मारे गए। भारत का संयुक्त राष्ट्र बयान इसी तनाव की देन है। इस बयान के मायने गहरे हैं। एक तरफ, यह भारत की कूटनीतिक समझदारी को रेखांकित करता है।

व्यावहारिक जुड़ाव से तालिबान को मान्यता दिए बिना मदद पहुँचाई जा सकती है। इसमें मानवीय सहायता, विकास कार्य और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग शामिल है। यह अमेरिका, यूरोप, रूस जैसे देशों के लिए नजीर बन सकता है। वे भी अफगानिस्तान को अलग-थलग करने की नीति से तंग आ चुके हैं। लेकिन दूसरी तरफ, कई सवाल खड़े हो जाते हैं। क्या यह तालिबान को हवा देगा? वह तो महिलाओं की पढ़ाई और काम करने पर रोक लगाता है। भारत को यह भी देखना होगा कि काबुल में हिंदू-सिखों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। पाकिस्तान और तालिबान की दुश्मनी भी अपनी जगह है ही। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन का भी ख़याल रखना होगा।

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तालिबान-पाक तनाव, टीटीपी और संयुक्त राष्ट्र के सामने नई चुनौती

सयाने बता रहे हैं कि भारत के बयान से क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगी है। यदि अफगानिस्तान स्थिर हुआ तो भारत-पाक तनाव भी कम हो सकता है। इस्लामाबाद का अफगान कार्ड कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन, पाक हमलों ने तालिबान-पाक रिश्ते खराब कर दिए हैं। टीटीपी जैसे गुटों को फायदा हो रहा है। वैश्विक पटल पर संयुक्त राष्ट्र को एकजुट नीति बनाने का मौका मिला है। तालिबान को सुधार के बदले राहत दी जा सकती है।

इससे भारत को भी फायदा होगा। चाबहार बंदरगाह से व्यापार बढ़ेगा। आतंक की जड़ें कमजोर होंगी। लेकिन खतरे भी मौजूद हैं। यदि तालिबान ने वादे तोड़े और आईएसआईएस-के से साठ-गाँठ जारी रखी, तो भारत की साख डगमगा सकती है। फिलहाल, भारत के बयान को इस बात का संकेत माना जा सकता है कि तालिबान यदि महिलाओं के अधिकारों की बहाली और आतंकमुक्ति की ओर कदम बढ़ाए, तो भारत पुल का काम कर सकता है। वैश्विक नजरिए से, यह बहुपक्षीयता की जीत होगी। अंत में, भारत का यह बयान साहस का प्रतीक है। यह व्यावहारिकता और नैतिकता का मेल दर्शाता है। लेकिन सब कुछ तालिबान की मंशा और क्षेत्रीय सहयोग पर टिका है। काबुल सुनेगा या नहीं? समय बताएगा।

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