राजीव वर्मा का रंगकर्म

राजीव वर्मा कला-जगत की नामचीन्ह शख्सियत हैं। टीवी और फिल्मों में अपने संजीदा और प्रभावी अभिनय से उन्होंने अलग प्रतिष्ठा और पहचान अर्जित की है। सन् 1987-88 में टीवी सीरियल चुनौती में प्रिंसिपल का किरदार निभाया था। इसके बाद छोटे और रुपहले पर्दे पर पिता, पति और प्राचार्य की भूमिकाएं निभाकर खूब लोकप्रियता बटोरी। मुजरिम हाजिर हो और मिसेज कौशिक में उन्हें सराहा गया। मैंने प्यार किया, दीदार, हम दिल दे चुके सनम, ये रास्ते हैं प्यार के, हम साथ-साथ हैं, कच्चे धागे, बीबी नं. 1, हिम्मतवाला, जीत, चलते-चलते और हर दिल जो प्यार करेगा जैसी फिल्मों से उनकी अलग छवि बनी।

यह सुखद है कि टीवी और फिल्मों में सफलता के बावजूद उन्होंने रंगकर्म नहीं छोड़ा और इन दिनों लगातार सक्रिय हैं। भोपाल (उनका गृह नगर) ने उनके रंगकर्म को नई द्युति दी है। नाटकों के सधे निर्देशन के साथ ही वह अपने अभिनय कौशल से पृथक छाप छोड़ते हैं। विश्व रंगमंच दिवस पर राजीव भाई ने अपने नए धमाके की ख़बर दी। उनके अनूठे धारावाहिक छोटी-बड़ी बातें के नवें एपिसोड में तीन लघु नाटिकाओं का गुलदस्ता था- आख़िर तुम्हें आना है, ज़रा देर लगेगी, दूसरी अटैची केस और तीसरी कुछ तो कहिए।

पीढ़ियों के बीच संवाद और भावनाओं का टकराव

नाटक क्या थे, हमारे घरों में रोज़मर्रा की बेहद महीन और नाजुक संवेदनशील घड़ियों का खुलासा था। पूरे समय लगता रहा कि अरे! यह तो हमारी अपनी कहानी है। आख़िर तुम्हें आना है,. जरा देर लगेगी की बात करें, तो घर का बेटा परदेस में है। उसने अपने आने की ख़बर पिता को दी है। माँ की खुशियों का पारावार नहीं है। घुटने की तकल़ीफ भूलकर वह बेटे की पसंद के बेसन लड्डू बनाने में लगी हैं। देह का दर्द ममता भरे दिल में समा जाता है। घंटों की मेहनत का मज़ा पिता जी लेते हैं।

बीवी को तंग करते हैं कि बेटे के लिए तो सब कुछ न्यौछावर और हम बेचारे तरसते ही रहते हैं, तुम्हारे हाथ का कुछ अच्छा-सा खाने के लिए। इसी नोक-झोंक के दरम्यान सूचना मिलती है कि बेटे ने अपनी यात्रा टाल दी है। बेटे ने लाड़ के गुब्बारे में सुई चुभो दी है। यही कथा है, कहीं बेटा मां के ज़रिए पिता से संवाद करता है तो कभी पिता के माध्यम से मां को संदेश भेजता है। पीढ़ियों के बीच संप्रेषण के तऱीके पर कहीं टकराव है तो कहीं पिता नहीं पचा पाता कि बेटा उससे बदतमीजी से बरताव क्यों करता है।

बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा पर उठे सवाल

पिता सोचता है कि उसने अपने पिता से तो कभी ऊँची ज़बान में बात नहीं की। फिर बेटा ऐसा क्यों कर रहा है? उसने कभी कॉलेज की पढ़ाई के लिए भी पैसे पिता से नहीं मांगे और ये बच्चे बुढ़ापे की जर्जर देह को भी एटीएम समझ बैठे हैं। नहीं दो तो बैंक में पैसे बचाकर नहीं रखने का ताना देते हैं। बच्चों की पढ़ाई में खर्च हो गए, यह तर्क भी वे नहीं सुनना चाहते। सत्तर साल के बाप से कहते हैं – तबियत ख़राब है तो डॉक्टर को जाकर दिखाते क्यों नहीं? जिम तो ज्वाइन कर ही सकते हो। संयुक्त परिवार बिखर गए, दरक गए, लेकिन अब एकल परिवार में भी चटकन दिखने लगी है।

अटैचीकेस में कुछ ऐसा ही नज़र आता है। पति का भाई आए तो खातिरदारी करने में पत्नी की नानी मरती है और मायके से भाई आए तो घुटने और कमर का दर्द क़ाफूर हो जाता है। पति बेचारा ठगा-सा रह जाता है। कुछ तो कहिए में एक महिला का दुःख है। पचपन – साठ की उमर आते-आते महिला को लगता है कि उसकी ज़िंदगी तो घर, पति और बच्चों की सेवा में गई। अपने पर ध्यान नहीं दे पाई।

कलाकारों के सशक्त अभिनय से गूंजा नाट्यागार

अक़्ल तब आई, जब भाई मिलने आया तो उसने बहन से जवानी के दिनों का गुलाबी ड्रेस पहनने का आग्रह किया और कैफे में जाकर कॉफी पीने की ख्वाहिश का इज़हार किया। तब उसे लगा कि वो औरत तो उसके भीतर से मर चुकी है। अब सन्नाटा ही शेष है। क्या कहूं! राजीव और रीता भाभी हों तो मंच लूट ही लेते हैं, लेकिन अन्य कलाकारों ने कमाल का अभिनय किया। नाट्यागार कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा तो बार-बार आँखों में आंसू भी लाया। सब यह सोच रहे थे कि उसके घर की बात स्टेज पर कैसे आई? वह कनखियों से बगल वाले को देखता।

शायद यही सोचते हुए कि कहीं बाजू वाला भी तो यही नहीं सोच रहा है, पर कलेजे के भीतर की बात कहीं कनखियों से दिखती है भला? कुल मिलाकर लौटते हुए मन भारी था तो हल्का भी था, दोनों अहसास एक साथ। मैंने तो कभी अनुभव नहीं किया। हां, याद आता रहा कि हम भी चालीस – पैंतालीस साल पहले तक मंच पर उतरते थे। बहरहाल, इन नाटकों के मंच और नेपथ्य के किरदारों की बात करें तो आखिर तुम्हें जाना है, जरा देर लगेगी का नाट्य-रूपांतरण लेखिका रिशा गुप्ता और संजय आरजू बड़ौतवी ने किया। मंच पर थे- रीता वर्मा, राजीव, महुआ चटर्जी, अर्चना शर्मा और वर्ष मिश्रा।

सादी मंच-परिकल्पना और संगीत ने नाटक को बनाया प्रभावी

रजिया सज्जाद जहीर लिखित कुछ तो कहिये की नाट्य रूपांतरकारा बिश्ना चौहान हैं। सिम्मी के किरदार में महुआ चटर्जी, प्रवीण महुवाले ने जावेद, वीरेन्द्र श्रीवास्तव ने महमूद मियां, सुप्रजा आर्य पांडेय ने परवीन और शौर्य सिंह हजारी ने असगर की भूमिका निभायी। इनाम मियां के किरदार में राजीव वर्मा ने रंग भर दिया। इसी क्रम में राजेंद्र कुमार शर्मा के अटैची केस में रीता वर्मा ने सरोज, प्रवीण ने शंकर, सुनील सक्सेना ने धनिया और कुनाल पुरोहित ने नरेंद्र का किरदार निभाया। बतौर निर्देशक राजीव सभी कलाकारों से अच्छा काम लेने में सफल रहे। उमेश तरकस्वार भौर रवीन्द्र टॉक का संगीत कथ्यानुरूप था।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

मंच संचालन और व्यवस्था का जिम्मा रविकांत पटेल, कुनाल पुरोहित, पवित्र नस्कर और शौर्य सिंह ने सँभाला। मंच-परिकल्पना सादी और आकर्षक थी। कोई आडंबर और तामझाम नहीं। इसका श्रेय दिनेश नायर के साथ स्वयं राजीव वर्मा ने वहन किया। तीनों नाटक देखने के बाद प्रेक्षागृह से निकले तो हमारे होंठों पर एक ही शब्द थे- थैंक्यू राजीव भाई… थैंक्यू रीता भाभी। चलते-चलते राजीव भाई ने खुशखबर दी कि कुछ ही दिनों में वह चौथी सिगरेट के साथ प्रस्तुत होंगे।

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