धर्म जोड़ता है

प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार, विश्व में जितने भी धर्म या संप्रदाय आज मौजूद हैं, उन सभी के स्थापकों ने अपने उपदेशों में स्पष्ट रूप से कहा है- प्रेम सर्वोच्च है। इसी वजह से माना जाता है कि उसकी रचना को प्यार करे बिना, रचयिता का प्यार पाना नामुमकिन है। अत धर्म की शुरुआत मनुष्य के लिए मनुष्य के निस्वार्थ प्रेम के द्वारा होती है। जैसे एक बच्चे को पढ़ाई में मार्गदर्शन करने के लिए एक अच्छे शिक्षक की जरूरत पड़ती है, वैसे ही समाज को भी धर्म के मूल को समझने के लिए एक अच्छे गुरु या आध्यात्मिक शिक्षक की आवश्यकता पड़ती है।
यही कारण है कि धार्मिक शिक्षकों को अपने समुदाय की अंतरात्मा व विवेक के संरक्षक के रूप में देखा जाता है और उनके जीवन द्वारा शास्त्रां में निहित नैतिक मूल्यों का व्यावहारिक प्रदर्शन होता रहे, यही उम्मीद की जाती है। यदि वे अपनी नैतिक ऊंचाइयों को बनाए रखने में असफल होते हैं तो उसका परिणाम सामाजिक असंतुलन के रूप में सभी को भोगना पड़ता है। मनुष्यों के मन में एक प्रश्न उठता है कि अब हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा? इसलिए यह बखूबी कहा गया है कि यदि नमक का स्वाद ही बिगड़ जाए तो वह किस वस्तु से नमकीन होगा?
पिछले कुछ वर्षों से संपूर्ण विश्व बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगों की मार झेल रहा है। परिणामस्वरूप सार्वभौमिक अनिश्चितता एवं भय का वातावरण निर्मित हो गया है। ऐसे में यदि विश्वभर के धार्मिक व आध्यात्मिक शिक्षक अपने-अपने समुदाय के लोगों को परस्पर प्रेम की मूल धार्मिक अवधारणा से अवगत कराकर उन्हें शांति और सद्भाव के साथ जीने के लिए प्रेरित करें, तो सांप्रदायिक हिंसा या दंगों का अवसर नहीं रहेगा। यदि हम सचमुच ही ऐसी दुनिया चाहते हैं, जहाँ सांप्रदायिक सद्भाव एवं आपसी भाईचारा हो, तो हमें आध्यात्मिकता को अपने जीवन में स्थान देना होगा।
विचारों का प्रभाव: शांति और अशांति का अनुभव
यही एक ऐसी कड़ी है जिसका अभाव सभी समस्याओं का कारण है। आध्यात्मिकता के अनुसार शांति हर आत्मा का स्वधर्म है, शांति हम सभी के भीतर निवास करती है। परंतु यह कैसी विडंबना है कि जो शांति हमारे भीतर है और हम उसे बाहर ढूढ़ रहे हैं? स्मरण रहे, शांति हमारी सोच में है।

अत: हम यदि शांति का चिंतन करेंगे तो हम शांति का ही अनुभव करेंगे और यदि हम अशांति का चिंतन करेंगे तो अशांति का अनुभव करेंगे। इसलिए सदैव यह बात याद रखें कि आप वही हैं, जो आप सोचते हैं और आप जो सोचते हैं, वही आप बन जाते हैं। तो आइए, आध्यात्मिकता द्वारा धर्म के मूल को समझकर मन की नकारात्मकता से खुद को आज़ाद करें और शांति तथा आनंद की अनुभूति करके सद्भावना रूपी बहुमूल्य हीरे द्वारा समस्त जगत में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करें।
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