नुस्खे एक लघु कथा

गोलू बहुत खुश था, कई दिनों बाद आज सोमवार को उसके स्कूल की छुट्टी होने के कारण पिता के साथ फड़ (ठेला) लगाने सोम बाजार जा पाएगा। बाजार की चहल-पहल के बीच फड़ पर हो रही पी का हिसाब-किताब रखने में उसे बहुत आनंद मिलता था। तीन गठरियों में सामान बांधा गया था, जिसे उठाकर पिता-पुत्र मुख्य सड़क पर आ गए थे और किसी रिक्शा वाले की तलाश में नज़रें दौड़ा रहे थे। तभी गोलू को एक रिक्शा आता दिखा, उत्साह में उसने उसे रोक लिया।

नहीं… पिता ने उसे टोका, इसे जाने दो। दूसरा रिक्शा आया तो पिता ने उसे भी नहीं रोका, जाने दिया। तभी तीसरा रिक्शा आता दिखाई दिया। गोलू ने आशाभरी नज़रों से पिता की ओर देखा। यह बहुत अनाप-शनाप पैसे मांगेगा। रिक्शे वाले को बहुत ध्यान से देखते हुए पिता ने कहा। आप रिक्शे वाले में ऐसा क्या देख लेते हैं, जो आपको बिना उससे बात किये ही पता चल जाता है कि उलटे-सीधे पैसे मांगेगा। गोलू ने पूछा।

यह नुस्खा तुम्हारे दादा जी ने मुझे बताया था। वे कहते थे- रिक्शा करते समय रिक्शेवाले के पैर देखो, अगर पैर में जूते हैं तो उसे मत लो, अनाप-शनाप पैसे मांगेगा। यदि नंगे पैर है तो वाज़िब पैसे मांगेगा। यानी जो जितना अधिक देहाती और ग़रीब होगा, वो उतना ही हमारे मतलब का होगा। जब बड़ी देर तक बिना चप्पल-जूते के रिक्शावाला नहीं मिला, तो पिता-पुत्र पैदल ही सोम बाजार की ओर चल दिए।

दो गट्ठर पिता ने उठा रखे थे, एक गोलू ने। उस दिन खूब अच्छी पी हुई थी। देखते ही देखते उनका अधिकतर सामान बिक गया था। अच्छी पी होने के कारण पिता की ख़ुशी उसके हाव-भाव से छलक रही थी। गोलू को भी ढेर सारे रुपये गिनकर रखने में ऐसी ख़ुशी मिली थी, जो पहले कभी नहीं मिली थी। दोनों ख़ुशी-ख़ुशी वापस लौट पड़े। सामान के नाम पर उनके पास एक छोटी-सी गठरी थी, जिसके लिए रिक्शे की कोई ज़रूरत नहीं थी।

आज अच्छी कमाई हुई है, हम रिक्शे से चलेंगे। पिता ने प्यार से गोलू के गाल थपथपाते हुए कहा। पापा, नंगे पैर वाला देहाती रिक्शेवाला!! एक रिक्शेवाले पर गोलू की नज़र पड़ी तो वह चिल्ला पड़ा। गोलू ने रिक्शेवाले को आवाज़ लगाई, उसने उचटती-सी नज़र उन पर डाली और गुनगुनाता हुआ उनके बगल से निकल गया। यह देखकर पिता का पारा चढ़ गया, लगता है, आज हराम की कमाई हुई है।

दूसरा रिक्शेवाला भी उन्हें नज़रअंदाज़ कर निकल गया। पिता का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। नंगे पैर वाली शर्त आज के लिए छोड़ते हैं। किसी को भी रोककर बैठ लो। क्या हम गरीब-गुरबे हैं! पिता ने ताव में कहा। उन्होंने तीन खाली रिक्शे रोकने की कोशिश की, पर किसी ने रुकना तो दूर, उनकी ओर देखा तक नहीं। बहुत चर्बी चढ़ गई हैं सालों के।

मुंहमांगे पैसे देने को तैयार हैं, तो भी नहीं जाएंगे, हरामखोर! पिता खुद को अपमानित महसूस कर गुस्से में बड़बड़ाए जा रहे थे। तभी गोलू के मन में एक विचार जागा, जब हमारे दादा जी अपने बेटे को यह नुस्खा दे सकते हैं कि किस तरह के रिक्शेवाले को चुनना चाहिए तो रिक्शेवालों के पिताओं ने भी अपने बच्चों को अच्छी सवारी चुनने का नुस्खा ज़रूर बताया होगा। उसका मन हुआ कि यह बात पिता से कहे, पर उनके गुस्से में तमतमाए चेहरे पर नज़र पड़ते ही वह चुप हो गया।

सुकेश साहनी

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